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Lokasaahity Ka Lokapaksh : Siddhant Evan Vyavahar (लोकसाहित्य का लोकपक्ष : सिद्धान्त एवं व्यवहार )
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“औसत बुद्धि लोक और शास्त्र को परस्पर विरोधी के रूप में देखती है। लोक में क्या नहीं आता? ‘समस्त’ है लोक में, यहाँ तक कि ‘इहलोक’ और ‘परलोक’ भी। नागरता के अभिमान का चश्मा भाषा के मूल स्रोत को अमेरिकी ‘फोक’ के रूप में देखता है। इसीलिए उसकी समझ में भाषाओं के विकास की यह प्रक्रिया नहीं आती कि जब साहित्य की भाषा अपने समय की चेतना का वाहक बनने का सामर्थ्य खो देती है तब रचनाकार लोकभाषा के शब्दों की ओर आकृष्ट होते हैं। वे शब्द लोकसंवेदना से प्रत्यक्ष रूप में जुड़े होते हैं, इसीलिए साहित्य में स्वीकृत होते चले जाते हैं। दो-ढाई सौ वर्षों के बाद यही प्रक्रिया पुनः घटित होती है। यही भाषाओं के विकास की प्रक्रिया है।
—रामदेव शुक्ल
★★★
आज समग्र यूरोप और अमेरिकाव्यापी लोकसाहित्य का जो इतना व्यापक अनुशीलन दिखाई देता है, उसके मूल में भी वृन्दावन गाँव के विछोह की वेदना है। किन्तु नागरिक समाज में लोकसाहित्य के प्रति जो अनुराग दिखाई दिया है, वह वैज्ञानिक दृष्टिभंगी द्वारा नियन्त्रित नहीं है। इसीलिए इसमें थोड़ी-थोड़ी कृत्रिमता आ गयी है। संहत सामाजिक जीवन द्वारा निर्वासित होने के कारण नागरिक समाज की समष्टि या समाज के सम्बन्ध में और कोई दायित्व नहीं रह जाता। लोकसाहित्य का क्रम विकास एक विशिष्ट धारा के भीतर से सम्भव हुआ है। उस धारा के साथ ग्राम्य समाज परिचित था। यहाँ तक कि एक प्रकार से कहा जा सकता है कि वह धारा ग्राम्य संहत सामाजिक जीवन में ही निहित थी। किन्तु उसके साथ नागरिक समाज से परिचित होने की बात होती है। उसी कारण लोकसाहित्य किसी-किसी क्षेत्र में एक प्रकार से नागरिक रूप प्राप्त कर सका है। कहना न होगा कि इसी कारण अनेक क्षेत्रों में ही यह कृत्रिम मालूम होने लगा है। जो लोक लोकसाहित्य की आलोचना करते रहते हैं, वे भी अनेक समय लोकसाहित्य की रचना करने के लिए दायी होते हैं।
—हरिश्चन्द्र मिश्र
”
| Weight | 0.5 kg |
|---|---|
| Dimensions | 22.59 × 14.34 × 1.82 cm |
| Author | Pro. Harishchandra Mishra, Edited by Pawan Sao (प्रो. हरिश्चन्द्र मिश्र, सम्पादक : पवन साव ) |
| Language | Hindi |
| Publisher | Vani Prakashan |
| Pages | 390 |
| Year/Edtion | 2024 |
| Subject | Criticism |
| Contents | N/A |
| About Athor | "हरिश्चन्द्र मिश्र (जन्म: 1954, आज़मगढ़, उ.प्र.)। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से शोध कार्य करने के बाद विश्वभारती शान्तिनिकेतन के हिन्दी विभाग में 1982 से अध्यापन कार्य। अध्यापन कार्य के साथ ही आलोचनात्मक लेखन, अनुवाद कार्य। भाषा सीखने की बलवती इच्छा के कारण लैटिन, बांग्ला, ओड़िआ एवं तमिल भाषा में सर्टिफ़िकेट, डिप्लोमा प्राप्त किया। कई आलोचनात्मक, विश्लेषणात्मक ग्रन्थों का लेखन, पाँच प्रमुख ग्रन्थों का हिन्दी में अनुवाद प्रकाशित, तीन ग्रन्थ प्रकाशनाधीन हैं। मूल ग्रन्थों की संख्या आठ तक है। रचनात्मक लेखन में स्मृतशब्दचित्र के रूप में बवण्डर के भूत तीन खण्ड में प्रकाशित। लोकसाहित्य में भी विशेष रुचि और इस विषय के दो ग्रन्थ प्रकाशित। विभिन्न विषयों पर 90 निबन्ध, शोध-निबन्ध एवं लेख प्रकाशित। ★★★ पवन साव |














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