| अपना-अपना आस्माँ – ‘अपना-अपना आस्माँ’ सदा अम्बालवी का तीसरा ग़ज़ल संग्रह है जो उनके चाहने वालों के लिए ग़ज़ल की एक नयी उम्मीद बनकर उनके सामने है। ग़ज़ल के लिए उर्दू जुबान बहुत ही माकूल साबित हुई और रफ़्ता-रफ़्ता हिन्दुस्तान में ग़ज़ल की मक़्बूलियत बढ़ती गयी। ग़ज़ल को बड़ी तादाद में पसन्द किया जाता है, पढ़ा और सुना भी जाता है। यह किताब हिन्दी-उर्दू पाठकों के लिए ग़ज़लों का एक ख़ूबसूरत तोहफ़ा है। |
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Apna Apna Aasman (अपना अपना आस्माँ)
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| अपना-अपना आस्माँ – ‘अपना-अपना आस्माँ’ सदा अम्बालवी का तीसरा ग़ज़ल संग्रह है जो उनके चाहने वालों के लिए ग़ज़ल की एक नयी उम्मीद बनकर उनके सामने है। ग़ज़ल के लिए उर्दू जुबान बहुत ही माकूल साबित हुई और रफ़्ता-रफ़्ता हिन्दुस्तान में ग़ज़ल की मक़्बूलियत बढ़ती गयी। ग़ज़ल को बड़ी तादाद में पसन्द किया जाता है, पढ़ा और सुना भी जाता है। यह किताब हिन्दी-उर्दू पाठकों के लिए ग़ज़लों का एक ख़ूबसूरत तोहफ़ा है। |
| author | Sada' Ambalavi (सदा अम्बालवी) |
|---|---|
| publisher | Vani Prakashan |
| language | Hindi |
| pages | 80 |














