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Zamane Ke Nayak (ज़माने के नायक)

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वह कंजर्वेटिव थी। लेकिन उस गहरे संकट-बोध से प्रभावित थी। उसी गहरे संकट-बोध से टी. एस. इलियट ने ‘ट्रेडिशन एंड इंडिविजवल टेलेंट’ लिखा था। पूरी नयी आलोचना की शुरुआत एक संकट-बोध से हुई थी। इसलिए आज कुछ लोग तो कोई पुस्तक छपी और उसकी समीक्षा लिखकर तुष्ट हो गये या परम्परा के मूल्यांकन के नाम पर कोई लेख लिख दिया, उसको भी आलोचना कहते हैं। आलोचना की शुरुआत और सार्थक आलोचना इस सभ्यता के संकट-बोध की चिन्ता से शुरू होती है। आज का मौजूदा समय सभ्यता के गहरे संकट-बोध का है। भारत जिस दौर से गुज़र रहा है, पोस्टकलोनियल भारत, उत्तर-उपनिवेश युग का भारत, जिस दौर में आन्तरिक तनाव और बाहरी हस्तक्षेप, हज़ारों साल की पुरानी सभ्यता के उत्तराधिकार से एक दौर में बहुत कुछ से वंचित कर दिया जाने वाला, फिर उसको नये सिरे से खोजने वाला-धर्म में, मिथकों में और साथ ही पश्चिमी दुनिया से आने वाले अनेक आधुनिक चुनौती देने वाले विचारों के साथ तालमेल बैठाने की चिन्ता के साथ। इस गहरे संकट-बोध का मुक़ाबला करने की इच्छा और इस चिन्ता से कितनी आलोचना उद्भूत हुई है, यह हम-आप सभी पड़ताल करें-देखें। हम यह भी देखें कि किस आलोचक की आलोचना इस चिन्ता से प्रस्थान कर रही है। कौन इससे एकदम बेख़बर होकर लिखे जा रहे हैं। मैं समझता हूँ, मेरी यही चिन्ता है। यह चिन्ता मैं अशोक में भी पाता हूँ।

Author

Weight 0.5 kg
Dimensions 22.59 × 14.34 × 1.82 cm
Author

Namvar Singh, Compiled & Edited by Vijay Prakash Singh & Ankit Narwal (नामवर सिंह, संकलन-सम्पादन : विजय प्रकाश सिंह, अंकित नरवाल)

Language

Hindi

Publisher

Vani Prakashan

Pages

206

Year/Edtion

2025

Subject

Criticism

Contents

N/A

About Athor

"नामवर सिंह
28 जुलाई, 1926 को चन्दौली जिला, उत्तर प्रदेश के जीयनपुर गाँव में जन्म प्राथमिक शिक्षा बगल के गाँव आवाजापुर में। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से बी. ए. और एम.ए.। 1953 में उसी विश्वविद्यालय में व्याख्याता के रूप में! अस्थायी पद पर नियुक्ति। 1959 में चकिया चन्दौली के लोकसभा चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार। चुनाव में असफलता के साथ विश्वविद्यालय से मुक्त। 1959-60 में सागर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर। 1960 से 1965 तक बनारस में रहकर स्वतन्त्र लेखन। 1965 में 'जनयुग' साप्ताहिक के सम्पादक के रूप में दिल्ली में। इस दौरान दो वर्षों तक राजकमल प्रकाशन के साहित्यिक सलाहकार। 1970 में जोधपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष पद पर प्रोफ़ेसर के रूप में नियुक्त। 1971 में 'कविता के नये प्रतिमान' पर 'साहित्य अकादेमी पुरस्कार'। इसके अलावा कई पुरस्कार और सम्मान। 1974 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (दिल्ली) के भारतीय भाषा केन्द्र में हिन्दी के प्रोफ़ेसर के रूप में योगदान। 1987 में वहीं से सेवा-मुक्त। अगले पाँच वर्षों के लिए वहीं पुनर्नियुक्ति और आजीवन प्रोफ़ेसर एमिरटस रहे। 1993 से 1996 तक राजा राममोहन राय लाइब्रेरी फाउंडेशन के अध्यक्ष बने। ‘आलोचना' त्रैमासिक के प्रधान सम्पादक और महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय। हिन्दी विश्वविद्यालय (वर्धा) के कुलाधिपति रहे।
निधन : 19 फ़रवरी, 2019

★★★

विजय प्रकाश सिंह
1 नवम्बर, 1949 को चन्दौली ज़िला के जीयनपुर गाँव में जन्म। हाईस्कूल तक की पढ़ाई जीयनपुर के पास शहीद गाँव से। बी.एससी. उदय प्रताप कॉलेज, वाराणसी से और एम. टेक. इंजीनियरिंग मास्को से। एयर इंडिया से सेवामुक्त हुए। स्वर्गीय पिता नामवर सिंह के बिसरे-बिखरे आख्यानों, आलेखों, अप्रकाशित सामग्री के प्रकाशन में लगातार सक्रिय। अब तक उनकी चौदह पुस्तकों का सम्पादन कर चुके हैं।

★★★

अंकित नरवाल
6 अगस्त, 1990 को जन्म। पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ से एम.ए. और पीएच. डी. (हिन्दी)। चार पुस्तकें—अठारह उपन्यास : अठारह प्रश्न, हिन्दी कहानी का समकाल, यू. आर. अनन्तमूर्ति : प्रतिरोध का विकल्प, अनल पाखी : नामवर सिंह की जीवनी प्रकाशित और कई पत्र-पत्रिकाओं में लेखन। आधार पाठक मंच के 'प्रथम युवा आलोचक पुरस्कार' (2018) और 'साहित्य अकादेमी युवा पुरस्कार' (2020) से पुरस्कृत।
सम्प्रति : असिस्टेंट प्रोफ़ेसर (हिन्दी), विधि विभाग, रीजनल सेंटर, पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़, "

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