“मेरी पूरी तालीम मराठी ज़ुबान में होने के बावजूद उर्दू से बेहद लगाव है। सोचता था कि क्या, एक ग़ैर-उर्दू ज़ुबाँवाला उर्दू में शायरी नहीं कर सकता, जबकि ऐसे-ऐसे मक़बूल शायर उर्दू में हुए हैं, जिनकी मादरी ज़ुबान उर्दू नहीं थी। ये तो लफ़्ज़ों, जज़्बातों का मामला है और ये चश्मा न जाने किस ज़ुबान में फूटे। जज़्बातों का आबशार अगर उर्दू में फूट रहा तो ऊपरवाले का ही करम है। मैं तो सिर्फ़ एक ज़रिया हूँ, तभी तो—
मैं अपने ख़्वाबों को मरने नहीं दूँगा;
ज़िन्दगी के हसीं लम्हों को डरने नहीं दूँगा।
मैंने अपने लम्हों को डर से दूर रखा, क्योंकि उन लम्हों को उर्दू अपनाना चाहती थी। फिर भी—
यार ठोकरें लगना तय है ज़िन्दगानी में;
मेरी मान तू ज़रा सम्हल के चला कर।
ख़याल तो हर किसी के दिल में आते रहते हैं ख़याल बिजली से भी ज़्यादा चंचल होते हैं उनको अगर लफ़्ज़ों में न बाँधा जाये तो तुरन्त ग़ायब हो जाते हैं। शुक्र है, मैं उन लफ़्ज़ों को अमली जामा देने में काफ़ी हद तक कामयाब रहा। कहाँ तक कामयाब रहा, यह तो आप बतायेंगे।
–पेशे लफ़्ज़ से
★★★
मैं ख़ुद से भी अनजान हूँ ये बात कुछ और है;
मैं तेरी ही पहचान हूँ ये बात कुछ और है।
मैं कुछ और होता तो बात कुछ और थी;
मैं सिर्फ़ इन्सान हूँ ये बात कुछ और है।
साँसें कितनी मिलीं क्या हैं इसके मायने;
मैं साँसों का मेहमान हूँ ये बात कुछ और है।
वैसे तो सबकी ज़ुबाँ पे बस मैं ही रहता हूँ;
मैं तेरा ही निशान हूँ ये बात कुछ और है।
मौत की उँगली पकड़ मैंने उसे चलाया है;
मैं ज़िन्दगी की जान हूँ ये बात कुछ और है।
— इसी पुस्तक से
“
















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