“यह मध्यकालीन हिन्दी के ऐसे संस्कारी और प्रतिभाशाली रचनाकार के काव्य की प्रस्तुति है जिससे हिन्दी-जगत् पहली बार अपनी समग्र-रचनाओं के साथ परिचित होगा । अभी तक यह माना जाता था कि वाजिद की रचनाएँ अनुपलब्ध हैं। इनके कुछ अरिल्ल अपने भ्रामक व अशुद्ध पाठों के साथ ‘पंचामृत’ और उसके आधार पर ‘सन्त सुधासार’ में छपे थे। फिर लम्बे समय तक चुप्पी रही । सन्त-काव्य की अग्रिम पंक्ति का यह कवि गुमनामी में खोया रहा । काव्य की अनुपलब्धता का मिथक जारी रहा। यह न टूटता, यदि सन्त रज्जब द्वारा सम्पादित प्राचीन हस्तलिखित प्रति संज्ञान में नहीं आयी होती। कवि की रचनाएँ ही उनकी सृजनात्मक प्रतिभा का सबसे बड़ा प्रमाण है। वे स्वयं अपनी स्वीकार्यता को बाध्य कर देंगी। वैसे भी गोरखनाथ के शब्दों में ‘अतीत
जात्रा सुफल जात्रा बोलै अंमृत बाणीं ।’
“
| Weight | 0.5 kg |
|---|---|
| Dimensions | 22.59 × 14.34 × 1.82 cm |
| Author | Govind Rajneesh (गोविंद रजनीश ) |
| Language | Hindi |
| Publisher | Vani Prakashan |
| Pages | 256 |
| Year/Edtion | 2014 |
| Subject | Rachnawali |
| Contents | N/A |
| About Athor | "गोविंद रजनीश जन्म : 10 सितम्बर, 1938 को राजस्थान के वैर कस्वे के ब्राह्मण परिवार में । शिक्षा : राजस्थान विश्वविद्यालय से एम. ए., आगरा विश्वविद्यालय से पीएच.डी. और डी.लिट्. । सैंतीस वर्षों तक विश्वविद्यालयों में अध्यापन। 1 जुलाई, 1999 को प्रोफ़ेसर पद से सेवानिवृत्त । इस दौरान उत्तर प्रदेश सरकार के भाषा सलाहकार तथा क.मुं. हिन्दी तथा भाषाविज्ञान विद्यापीठ के निदेशक रहे। जाने-माने साहित्यकार । तीस पुस्तकें प्रकाशित । पत्र-पत्रिकाओं के लिए नियमित लेखन । प्रमुख रचनाएँ : समकालीन हिन्दी कविता की संवेदना, साहित्य का सामाजिक यथार्थ, पुनश्चिन्तन, समसामयिक हिन्दी कविता: विविध परिदृश्य, रांगेय राघव का रचना-संसार, नयी कविता : परिवेश, प्रवृत्ति और अभिव्यक्ति, रांगेय राघव: प्रगतिशील होने का अर्थ (आलोचना)।" |














Reviews
There are no reviews yet.