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Utsav Ka Pushp Nahin Hoon (उत्सव का पुष्प नहीं हूँ)

Original price was: ₹450.00.Current price is: ₹292.00.

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“अनुराधा की कविताएँ अर्द्धनिमीलित आँखों की तरह धीरे-धीरे खुलती हैं। भीतर का अर्जित प्रकाश बाहर की चकाचौंध से सहज तादात्म्य नहीं बना पा रहा हो तो आँखें या कविताएँ धीरे-धीरे ही खुलती हैं ! आपबीती और जगबीती की विडम्बना कवि को अपने भीतर के गहनतम एकान्त में डुबकी लगवा देती है, उसके बाद जब कवि बाहर आती है, तब गहरे पानियों में समाधिस्थ ही बैठे रह गये नानकदेव की तरह ‘कोई और’ होकर । दुबारा वहाँ लौटना, जहाँ से धक्के खाकर गये थे, इतना आसान नहीं होता, फिर भी लौटना तो पड़ता है-बस दृष्टि बदल जाती है!

अनुराधा के यहाँ स्टेशन के वेटिंग रूम में गुड़ी-मुड़ी होकर सदियों से सोयी स्त्री ऐसी ही आत्मस्थ स्त्री है- ‘थोड़ा मारा रोय, बहुत मारा सोय’ की कहावत चरितार्थ करती स्त्री । उसकी नींद ही उसकी नानक वाली डुबकी है।

‘रोमैंटिक वैग्रेंट’ की अवधारणा भारत में कई कलेवरों में फूटी – रामनरेश शर्मा के ‘पथिक’, छायावादी कविता के ‘परदेसी’, राज कपूर के ‘आवारा’, राहुल सांकृत्यायन के ‘घुमक्कड़’, अज्ञेय के ‘यायावर’ की याद-भर दिलाकर इस प्रश्न पर आया जाये कि विलगावजन्य यही यायावरी एक हताश स्त्री के चित्त पर घटे और वह भी खुली सड़क पर भटकती फिरे तो क्या हो ! ध्यान रहे कि यह भटकन अधूरे प्रेम की पूर्णता की असम्भव तलाश-भर न होकर एक ऐसे बृहत्तर परिवेश की सम्भावना के स्रोतों की तलाश है जहाँ पेड़, पशु-पक्षी, कीट-पतंग और सब नस्लों-जातियों, लिंगों वर्गों के लोग मधुरिम पारस्परिकता के साथ सकें-स्पर्द्धा पीड़ित नहीं, सहकारिता-प्रेरित हो बृहत्तर संसार हमारा !

लम्बी गहरी साँसों की तरह सन्तुलित पूरे-पूरे वाक्यों में अनुराधा अपने उपाख्यान रचती हैं, अपने समय के गम्भीरतम प्रश्नों पर बेधक और मार्मिक आख्यान-उपाख्यान उकेरती हैं अनुराधा की कविताएँ, इस तरह उकेरती हैं कि अच्छाई फूल की तरह चटक जाये हड्डियों में । सत्य को स्वप्न की तरह बाँचने की कला इनकी साधी हुई है! चित्त की गहनतम मासूमियत से तभी तो ये उचार पाती हैं-
मुझ पर भरोसा मत करना
मैं एक महामारी से लड़ने के लिए
धरती के अलग-अलग कोनों में बैठे
तीन दोस्तों से
एक ही तारीख़ पर मिलने का वायदा कर लेती हूँ जीने का हठ मिलने में नहीं मिलने की उस बात में है
ताबीज़ की तरह बँधी है जो हमारे निर्जन दिनों की बाँह पर
मैंने अपनी हर क़ैद इन्हीं दिवास्वप्नों की
पीठ पर टिककर गुज़ारी है।
अधूरे छूटे प्रेमों से पटी पड़ी है दुनिया ! सब रास्ते बन्द हैं! सब अभिभावक शक्तियाँ पक्षाघात की शिकार टुकुर-टुकुर मुँह देखती हैं। बेटियाँ लाइब्रेरी से हॉस्टल लौटना चाहती हैं… और रास्ते ख़तरनाक हैं। घर कहीं नहीं है। कोई राह कहीं नहीं जाती। ऐसे समय में ये कविताएँ ही हैं, जो हर स्थिति में अँकवारती हैं टूटे-हारे मनुष्य को, दुलारती हैं उसे और कोई शर्त नहीं बदतीं-

प्रेम न करना चाहो तो लम्बी यात्रा के रूखे रुष्ट
सहयात्री से बैठे रहना चुपचाप मेरे पास
….उतर जाना बीच के किसी स्टेशन पर

ट्रेन, स्टेशन, जहाज़, लंगर, सड़कें बार-बार आती हैं कविताओं में और एक अकेली लड़की अपनी साइकिल सँभालती हुई ! उत्पादन के साधन बदलते हैं और यातायात के तो भाषिक अवचेतन में तैरते हुए बिम्ब और भाषिक लय-दोनों की प्रकृति बदलती हैं, पर कुछ मोटिफ हैं, जो बार-बार सर उठा लेते हैं-ख़ासकर इस तरह की प्राणवान कविताओं में सर उठाकर वे बज़िद खड़े हो जाते हैं कि हमें पढ़ो और हमारा निहितार्थ ढूँढ़ो!

-अनामिका
साहित्य अकादेमी से पुरस्कृत लेखिका”

Author

Weight 0.5 kg
Dimensions 22.59 × 14.34 × 1.82 cm
Author

Anuradha Singh (अनुराधा सिंह)

Language

Hindi

Publisher

Vani Prakashan

Pages

450

Year/Edtion

2023

Subject

Poetry

Contents

N/A

About Athor

"अनुराधा सिंह

अनुराधा सिंह समकालीन हिन्दी कविता का सुपरिचित चेहरा हैं। 2018 में भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित कविता संग्रह ईश्वर नहीं नींद चाहिए को पिछले दशक के सर्वाधिक पठित व प्रशंसित संग्रहों में गिना जाता है, इसे शीला सिद्धान्तकर सम्मान (2019) और हेमन्त स्मृति सम्मान (2020) से सम्मानित किया गया है।
आगरा में पली-बढ़ीं एवं मुम्बई व बेंगलुरु की निवासी अनुराधा एक समर्थ अनुवादक, सम्पादक व गद्यकार हैं। ल्हासा का लहू और बचा रहे स्पर्श इनकी उल्लेखनीय गय पुस्तकें हैं।

फिलहाल ये मुम्बई में प्रबन्धन कक्षाओं में बिज़नेस कम्युनिकेशन का अध्यापन करती हैं। प्रस्तुत कविता संग्रह में वर्ष 2017 से 2022 तक की इनकी कविताएँ संकलित हैं।

उत्सव का पुष्प नहीं हूँ लोगो
जीवन ने अपने पाट पर पंछीट-पैंछीट उजलाया है
वहीं वह नदी बहती थी सबकी
जो मेरे देखने भर से रेत हो जाती थी
अब, कुछ अच्छा आरम्भ होते ही
अपशगुनों के ताप से मेरे एकान्त का तालू चटकता है
बेचैन हो-होकर पूछती हूँ, एक बार और देख पढ़ लो
शायद ऐसे भा जाने वाला कुछ भी न हो मेरे पास

आदमी दो पाव बैंगन और भिण्डी भी
दो क्षण विचार कर ख़रीदता है
तुम्हें क्या हुआ है जो मुझसे साधारण मनुष्य पर आत्मा ख़र्चे दे रहे हो।

(इसी संग्रह से)

ईमेल : anuradhadei@yahoo.co.in"

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