“सुमन और सना –
साम्प्रदायिक नफ़रत की वजह से होने वाले दंगे हमारे देश में कोई नयी बात नहीं। इन दंगों की वजह से मिले मानसिक आघात के नियमितता के कारण ही शायद हमारा समाज सब मिलाकर धीरे-धीरे इन सब घटनाओं की तरफ़ से संवेदनहीन-सा होता जा रहा है। ‘सुमन और सना’ एक कोशिश है इस मुद्दे से जुड़े इन्सानियत की तड़प और तकलीफ़ के पहल पर ध्यान केन्द्रित करने की। नाटक दंगे के शिकार उन लोगों के बारे में है, जिन पर आक्रमण हुआ और जिन लोगों को अपने घरों को छोड़कर भागना पड़ा। यह बिना किसी राजनीतिक उचितता और अनुचितता से सम्बद्ध हुए तकलीफ़ों को जीवन्त करता है।
इस नाटक में, जो एक कोलाज की तरह लिखा गया है, दंगे में मारे गये लोगों की शरणार्थी शिविर की ज़िन्दगी की झलकियाँ प्रस्तुत की गयी हैं। ये कहानी है उन लोगों के प्रयत्न की जो अपनी चोट और तकलीफ़ों को भुलाकर अपनी आज की परिस्थितियों के साथ समझौता करने की कोशिश में जुटे हैं।
कहानी समय और अन्तराल को पार कर एक निःसहाय छोटी लड़की, जिसका नाम सुमन और सना है के आँखों देखी वृत्तान्त के रूप में पेश की गयी है। उसकी आँखों के रास्ते हम देखते हैं कि कैसे एक आदमी दूसरे आदमी की वजह से अपमान आशंका और जोख़िम से गुज़रता है, एक अनर्थ जिसे बशीर बद्र ने बहुत मर्मस्पर्मी शब्दों में पेश किया है “”लोग टूट जाते हैं, एक घर बनाने में””।
”
10 in stock
Suman Aur Sana (सुमन और सना )
₹95.00
<span class="ts-tooltip button-tooltip" data-title="Add to compare">Compare</span>| Weight | 0.5 kg |
|---|---|
| Dimensions | 22.59 × 14.34 × 1.82 cm |
| Author | Nadira Zaheer Babbar (नादिरा ज़हीर बब्बर ) |
| Language | Hindi |
| Publisher | Vani Prakashan |
| Pages | 62 |
| Year/Edtion | 2008 |
| Subject | Play |
| Contents | N/A |
| About Athor | "नादिरा ज़हीर बब्बर – |















Reviews
There are no reviews yet.