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Rashtriya Andolan Aur Sahitya – Kuchh Prasang : Kuchh Pravrittiyan (राष्ट्रीय आन्दोलन और साहित्य – कुछ प्रसंग : कुछ प्रवृत्तियाँ )

Original price was: ₹625.00.Current price is: ₹406.00.

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“राष्ट्रीय आन्दोलन और साहित्य – कुछ प्रसंग : कुछ प्रवृत्तियाँ – प्रेमचन्द हिन्दी में राष्ट्रीय आन्दोलन के दौर के सर्वश्रेष्ठ लेखक थे। फ़िल्म जगत के साथ उनकी टकराहट औपनिवेशिक संस्कृति में पल रहे पूँजीवादी व्यवसाय के साथ राष्ट्रीय आन्दोलन की ही टकराहट थी। लेकिन, राष्ट्रीय आन्दोलन का यह पक्ष कितना कमज़ोर था; इस टकराहट में हिन्दी का सर्वश्रेष्ठ लेखक भी कितनी कमज़ोर ज़मीन पर खड़ा था, इसे देखना हिन्दी की जातीय परम्परा की एक दुखती हुई नस को टटोलना है।

★★★

प्रेमचन्द फ़िल्मी दुनिया से लौट गये। ‘चित्रपट’ का आन्दोलन भी अगले कुछ सालों के बाद टूट गया। हिन्दी फ़िल्में राष्ट्रीय आन्दोलन का अंग न बन सकीं। हिन्दी फ़िल्में हिन्दी की जातीय संस्कृति से दूर ही रहीं; आज भी दूर हैं । इसके कारण क्या हैं?

★★★

कानपुर से गणेशशंकर विद्यार्थी के सम्पादन में प्रकाशित होने वाला साप्ताहिक ‘प्रताप’ हिन्दी प्रदेश में एक नयी जनवादी चेतना फैलाने वाले अग्रदूतों में था। ‘प्रताप’ ने हिन्दी प्रदेश के मज़दूर-किसानों में राजनीतिक चेतना जगाने में अपनी भूमिका निभायी। भारत के बुर्जुआ राष्ट्रवादी आन्दोलन में एक बड़ी समस्या जनता की एकता में बाधक साम्प्रदायिकता की थी। बुर्जुआ नेतृत्व अन्त तक इस समस्या का हल न निकाल सका। हल निकालना तो दूर रहा, राष्ट्रीय नेतागण स्वयं साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष को हिन्दू या मुस्लिम धार्मिक चेतना और प्रतीकों से जोड़कर, उसे धार्मिक रंग देकर संकीर्ण बना रहे थे। हिन्दू-मुस्लिम दंगों में शहीद होने वाले गणेशशंकर विद्यार्थी का महत्त्व यह है कि वे बहुत शुरू से ही साम्राज्यवाद विरोधी राजनीतिक संघर्ष को धर्मनिरपेक्ष चरित्र देने के लिए संघर्ष चला रहे थे। इसके लिए एक ओर तो उन्होंने स्वाधीनता आन्दोलन को मज़दूर-किसानों के बीच पहुँचाने का प्रयत्न किया, दूसरी ओर साम्प्रदायिकतावाद का विरोध किया। जिस ज़माने में मदनमोहन मालवीय, तिलक, गांधी और मोहम्मद अली, शौकत अली सब के सब राजनीति को धर्म के साथ मिलाकर पेश करते थे, उस ज़माने में ‘प्रताप’ (21 जून 1915) में ‘राष्ट्रीयता’ शीर्षक लेख में उन्होंने लिखा कि, “राष्ट्रीयता धार्मिक सिद्धान्तों का दायरा नहीं है।” उन्होंने राष्ट्रीय जागरण को एक अन्तरराष्ट्रीय लहर बतलाया। जो लोग ‘हिन्दू राष्ट्र, हिन्दू राष्ट्र’ चिल्लाते हैं, उनके बारे में उन्होंने लिखा कि ऐसे लोग बड़ी भूल करते हैं और उन्होंने अभी तक राष्ट्र शब्द के अर्थ नहीं समझे हैं।

Author

Weight 0.5 kg
Dimensions 22.59 × 14.34 × 1.82 cm
Author

Veer Bharat Talwar (वीर भारत तलवार )

Language

Hindi

Publisher

Vani Prakashan

Pages

260

Year/Edtion

2024

Subject

Criticism

Contents

N/A

About Athor

"वीर भारत तलवार –
जन्म : 20 सितम्बर 1947, जमशेदपुर (झारखण्ड)।
शिक्षा : बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से एम.ए. (हिन्दी)। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से पीएच.डी.। भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला में दो बार फ़ेलो। जे.एन.यू. में 24 वर्ष अध्यापन।
1970 के दशक में वामपन्थी आन्दोलन में पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय। अलग झारखण्ड राज्य आन्दोलन के सिद्धान्तकारों में एक। तीन पत्रिकाओं-पटना से फ़िलहाल (1972-74), धनबाद से शालपत्र (1977-78) और राँची से झारखण्ड वार्ता (1977-78) का सम्पादन-प्रकाशन। आदिवासी इलाक़ों में बड़े बाँधों के विकल्प पर शोध तथा राँची विश्वविद्यालय में आदिवासी भाषाओं का विभाग खुलवाने में विशेष भूमिका।
प्रकाशन : बग़ावत और वफ़ादारी : नवजागरण के इर्द-गिर्द, किसान, राष्ट्रीय आन्दोलन और प्रेमचन्द : 1918-22, राष्ट्रीय आन्दोलन और साहित्य, रस्साकशी, सामना (सभी वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली)। झारखण्ड के आदिवासियों के बीच (भारतीय ज्ञानपीठ )। हिन्दू नवजागरण की विचारधारा : सत्यार्थ प्रकाश, राजा शिवप्रसाद सितारेहिन्द : प्रतिनिधि संकलन (सम्पादन), राजा शिवप्रसाद सितारेहिन्द (मोनोग्राफ़), नक्सलबाड़ी के दौर में (सम्पादन), झारखण्ड आन्दोलन के दस्तावेज़, खण्ड 1, 2 और झारखण्ड में मेरे समकालीन।
सम्मान : झारखण्ड के आदिवासियों द्वारा दिया गया ‘भगवान बिरसा पुरस्कार' (1988-89) तथा ‘झारखण्ड रत्न' की उपाधि से विभूषित (2003)।

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