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Ramvilas Sharma Ka Lokpaksha (रामविलास शर्मा का लोकपक्ष )

Original price was: ₹350.00.Current price is: ₹227.00.

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“रामविलास शर्मा का लोकपक्ष –
रामविलास शर्मा का लोकपक्ष पुस्तक में पक्षधरता के कई सवाल हैं। डॉ. रामविलास शर्मा उच्छृंखल के पथ से हिन्दी में आये थे। तब भी वह हिन्दी की प्रगतिशीलता के योद्धा लेखक थे। जब वह आलोचना में प्रेमचन्द, रामचन्द्र शुक्ल, महावीर प्रसाद द्विवेदी और निराला को स्थापित कर चुके थे, तब भी वह विवादी आलोचक थे।
मार्क्स ने कभी यूरोप में एकता का स्वप्न देखा था। रामविलास शर्मा ने हिन्दी प्रदेश की कल्पनाशीलता और एकता का स्वप्न-अन्त तक देखा। वह कवि और आलोचक की रचना प्रक्रिया पर लगातर सोचते रहे, संवाद करते रहे। ऋग्वेद से भारतीय साहित्य की भूमिका पर वह लगातार विवाद के केन्द्र में रहे। पार्टीबद्ध मार्क्सवादी जहाँ शिविरबद्ध होते हुए रुक गये, वहीं ‘कवि’ ( पत्रिका 1957) से ‘भारतीय सौन्दर्यबोध और तुलसीदास’ पुस्तक तक विष्णुचन्द्र शर्मा ने डॉ. शर्मा से खुली बातचीत की है। मुक्तिबोध और नज़रुल पर लम्बी बहस की। कैसे तेज़ होगा जनवादी आन्दोलन इस पर मार्क्स और पिछड़े समाज में लम्बी बहस की। प्रेमचन्द और शुक्ल जी के लोकपक्ष का इतिहास आज रामविलास शर्मा की मान्यताओं का इतिहास है।
विष्णुचन्द्र शर्मा ने अपने पत्रों में आलोचक से कुछ सवाल उठाये हैं। डॉ. शर्मा के ‘ऋग्वेद’ का पश्चिम एशिया से नाता खोजा है। ‘नवजागरण’ की भूमिका देखी-परखी है। यह एक भाषा वैज्ञानिक, इतिहासकार और दार्शनिक का दास्तान है, जिसे विष्णुचन्द्र शर्मा ने ‘आलोचक का मानस’ कहा है। इस मानस के मूल में है ‘आलोचना लड़ाई की नहीं बहस की जगह है।’ यह लड़ाई आज भी पराजयवाद के विरुद्ध जनपक्ष की भूमिका के रूप में इस पुस्तक में कई धरातल पर क़ायम है। पुस्तक एक संवाद है। विवाद है लोकपक्ष की मान्यता पर नये दृष्टिकोण से सोचने वालों के लिए एक ज़रूरी किताब है रामविलास शर्मा का लोकपक्ष।

Author

Weight 0.5 kg
Dimensions 22.59 × 14.34 × 1.82 cm
Author

Vishnuchandra Sharma (विष्णुचन्द्र शर्मा)

Language

Hindi

Publisher

Vani Prakashan

Pages

176

Year/Edtion

2010

Subject

Criticism

Contents

N/A

About Athor

"विष्णुचन्द्र शर्मा –
जन्म : 1 अप्रैल, 1933।
विष्णुचन्द्र शर्मा प्रेमचन्द की काशी के लेखक हैं। लोकपक्ष की मान्यताओं पर उन्होंने लगातार बहस की है। निराला की निराशा के बाद उन्होंने त्रिलोचन के आशावाद को देखा-परखा है– कवि (1957) और सर्वनाम (2009) तक में। नागार्जुन एक लम्बी जिरह उसी मुठभेड़ का लोकपक्ष बताती है।
कबीर क्या कभी मठाधीश थे? यह सवाल पूछते हुए विष्णुचन्द्र शर्मा ने 'कबीर की डायरी' लिखी है। भगत सिंह के बाद क्या वैदिक मानवतावाद के प्रवक्ता रामविलास शर्मा क्रान्तिकारी थे। ऐसे सीधे सवाल पूछने की लोकायत दर्शन की परम्परा के विष्णुचन्द्र शर्मा प्रवक्ता रहे हैं। पुस्तक पकी आँखें लिखें विष्णुचन्द्र शर्मा या मुक्तिबोध की आत्मकथा लिखें। वह राहुल सांकृत्यायन के समय साम्यवादी दौर के हिस्सेदार मार्क्सवादी रहे हैं।
एक घुमक्कड़ कवि के नाते वह अभी पेरिस (फ्रांस), न्यू यॉर्क, वाशिंग्टन, लास एंजिलस, ह्यूस्टन (अमेरिका), मैक्सिको और बर्लिन (जर्मनी) घूम कर आये हैं। चार मास की यह यात्रा, एक कवि की यात्रा है, जिसमें उन्होंने दो कविता संग्रह तैयार किये हैं : मेरा एक बिम्ब बचा है, दूसरा थिएटर हम है।
घुमक्कड़ी के बीच में वह लगातार अपने समय की पतनशील सभ्यता से टकराते रहे हैं। विडम्बना उपन्यास इसी इतिहास से संवाद की कथा है। अपने बेगाने उपन्यास में वह यूरोप और भारत की संवेदना की खोज करते हैं। चलत चलत पैंजनिया टूटी उपन्यास में उसी यात्रा की कहानी इन्होंने लिखी है।
जब एक पात्र उनकी जीवन यात्रा में आता है और वह उसे अपना पोस्टर और दोगले सपने की कहानियों में उतार देते हैं। धीरज का रथ (काव्य रूपक) में वह तुलसीदास की त्रासदी को रचते हैं। अन्त की शुरुआत और बेज़ुबान नाटकों में वह पतनशील भारतीय सभ्यता का चित्रण करते हैं।
"

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