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Nibandhon Ki Duniya : Pratapnarayan Mishr (निबन्धों की दुनिया : प्रतापनारायण मिश्र)

Original price was: ₹395.00.Current price is: ₹256.00.

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“निबन्धों की दुनिया – प्रतापनारायण मिश्र –
माना गया है कि हिन्दी गद्य और पद्य लिखने में हरिश्चन्द्र जैसे तेज़, तीख़े और बेधड़क थे, प्रतापनारायण भी वैसे ही थे। दूसरे लोग बहुत सोच-समझकर और बड़ी चेष्टा से जो ख़ूबियाँ अपने गद्य में पैदा करते थे, वह प्रतापनारायण मिश्र को सामने पड़ी मिल जाती थी। उनका सर्वाधिक मुखर साहित्यिक रूप उनके निबन्धों में ही मिलता है। इस चयन के रूप में उनके निबन्धों की दुनिया का सशक्त विशिष्ट और प्रतिनिधि रूप सामने लाया गया है। बानगी के लिए उनके कुछ निबन्धों का नाम लिया जा सकता है, जैसे ‘भों’, ‘पौराणिक गूढ़ार्थ’, ‘हो ओ ओ ओ ली है’, ‘मुच्छ’, ‘बज्रमूर्ख’ इत्यादि। ‘मुच्छ’ उनका दिलचस्प निबन्ध है।
मिश्र जी की लेखनी देशदशा, समाज-सुधार, नागरी-हिन्दी-प्रचार, साधारण मनोरंजन आदि सब विषयों पर चलती थी। यद्यपि उनकी प्रवृत्ति हास्य-विनोद की ओर ही अधिक रहती थी। मिश्र जी के ऐसे अनेक निबन्ध हैं जिन्हें सामाजिक-सांस्कृतिक कहा जा सकता है। इन निबन्धों के विषय नारी, पतिव्रता, रिसवत (रिश्वत), ख़ुशामद, भेड़िया धसान, बाल्य विवाह आदि हैं। इस दृष्टि से भी उनके निबन्धों को इस चयन में स्थान मिला है। उनका एक बहुत ही दिलचस्प लेख है- ‘यह तो बतलाइये’। भिगोभिगोकर मारने वाली शैली में लिखा गया है। पाठक मानेंगे कि अपनी सोच, दृष्टि, और कथ्य के साथ-साथ रवानगी से समृद्ध भाषा के कारण यह उनके महत्त्वपूर्ण निबन्धों में गिना जा सकता है। संस्कृत, अरबी, फ़ारसी और अंग्रेज़ी के शब्दों को भी मिश्र जी सहज ही आने देते थे-शर्त यह कि उनका प्रचलन जनता में हो। वस्तुतः वे भाषाओं का सम्बन्ध जन-जीवन के साथ देखना चाहते थे। पाठक पायेंगे कि उनकी भाषा एकदम प्रवाहमान यानी रवानगी से लबरेज़ है। कुल मिलाकर यह चयन प्रतापनारायण मिश्र और हिन्दी साहित्य के भारतेन्दुकालीन निबन्धों की उत्कृष्ट दुनिया का प्रतिनिधित्व करने में सक्षम है। अपने समय के लेखन और चिन्तन के व्यापक फलक को अपने में समोए इस चयन को पाठक निश्चित रूप से स्वागत के योग्य पायेंगे।

Author

Weight 0.5 kg
Dimensions 22.59 × 14.34 × 1.82 cm
Author

Editor Nirmala Jain (सम्पादक : निर्मला जैन)

Language

Hindi

Publisher

Vani Prakashan

Pages

395

Year/Edtion

2012

Subject

Essays

Contents

N/A

About Athor

"निर्मला जैन (प्रधान सम्पादक) –
'निबन्धों की दुनिया' श्रृंखला की प्रधान सम्पादक निर्मला जैन हिन्दी के विशिष्ट आलोचकों में हैं। वे दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी की प्रोफ़ेसर और विभागाध्यक्ष रही हैं। निर्मला जैन ने बहुत-सी किताबें लिखी हैं तथा अनेक महत्त्वपूर्ण रचनाओं का अनुवाद और कई पुस्तकों का सम्पादन किया है। उनकी कुछ प्रमुख रचनाएँ हैं: रस सिद्धान्त और सौन्दर्यशास्त्र, उदात्त के विषय में (लॉगिनुस की मूल पुस्तक के अनुवाद सहित), काव्य चिन्तन की पश्चिमी परम्परा और कथाप्रसंग : यथाप्रसंग। निर्मला जैन को अनेक सम्मानों तथा पुरस्कारों से समादृत किया गया है।
रामेश्वर राय(सम्पादक)
रामेश्वर राय की आरम्भिक शिक्षा पश्चिम बंगाल और बिहार में हुई। दिल्ली विश्वविद्यालय से उन्होंने डॉक्टरेट प्राप्त किया। अपनी आलोचना दृष्टि के लिए प्रशंसित रामेश्वर राय 1989 से दिल्ली के हिन्दू कॉलेज में अध्यापन कर रहे हैं।
मलयज –
मलयज का जन्म 1935 में पूर्वी उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ ज़िले के महुई गाँव में एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार में हुआ। आरम्भिक शिक्षा गाँव में हुई। 1963 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उन्होंने अंग्रेज़ी में एम.ए. किया। जीविका की तलाश में वे 1964 में दिल्ली आये। परिवार का दिया हुआ नाम 'भरतजी श्रीवास्तव' प्रमाण पत्रों में रह गया। साहित्य में वे मलयज नाम से आये। दिल्ली में मलयज ने केन्द्रीय कृषि और सिंचाई मन्त्रालय के विस्तार निदेशालय में अंग्रेज़ी पत्रिकाओं के सह-सम्पादक के रूप में नौकरी की। ‘पूर्वग्रह' के प्रारम्भिक सम्पादक मण्डल के सदस्य रहे। आकाशवाणी के लिए बालोपयोगी नाटक लिखे। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के लिए स्तम्भ-लेखन और अनुवाद किये।
उनका पहला काव्य संग्रह 'जख़्म पर धूल' 1971 में और दूसरा संग्रह 'अपने होने को अप्रकाशित करता हुआ' 1980 में प्रकाशित हुआ। विभिन्न पत्रिकाओं के लिए लिखे गये आलोचनात्मक निबन्धों का संकलन 'कविता से साक्षात्कार' 1979 में छपा।
उनकी कहानियाँ, यात्रा-वृत्तान्त और डायरी के अंशों का मिलाजुला संग्रह 'हँसते हुए मेरा अकेलापन' मरणोपरान्त 1982 में प्रकाशित हुआ। अप्रैल 1982 ई. में मलयज के आकस्मिक निधन के कारण लेखन की अनेक योजनाएँ अधूरी रह गयीं। वे साहित्य अकादेमी के लिए रामचन्द्र शुक्ल पर एक पुस्तिका लिख रहे थे। एक निबन्ध-संकलन उन्होंने तैयार कर लिया था जो 1984 में 'संवाद और एकालाप' नाम से छपा रामचन्द्र शुक्ल पर लिखी गयी अधूरी किताब और बत्तीस वर्षों में लिखी हुई डायरी तीन खण्डों में नामवर सिंह के सम्पादन में 2000 ई. में प्रकाशित हुई।

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