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Nazar-Nazar Mein Jharkhand (नज़र-नज़र में झारखण्ड)
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“झारखण्ड की 32 जनजातियों में पहाड़िया और असुर यहाँ की सबसे प्राचीन रहवासी हैं। इनके आने का कोई इतिहास नहीं मिलता। मुण्डा ईसा पूर्व छठवीं शताब्दी में यहाँ आये। अपने परिश्रम से जंगलों को साफ़ किया। खेती योग्य ज़मीन तैयार की। इसके पूर्व असुर से उनका संघर्ष भी हुआ। इनके बहुत साल बाद मुगलकाल में उराँवों ने…। मुण्डा, मुण्डारी बोलते हैं जो मुण्डा परिवार की भाषा है और उराँव कुडुख बोलते हैं जो द्रविड़ भाषा परिवार की है। मुण्डा परिवार की सन्ताली, हो, खड़िया भी बोली जाती है। द्रविड़ परिवार की कुडुख-मलतो आदि बोली जाती है। यहाँ भारोपीय भाषा परिवार की भाषा बोलते हैं। हिन्दी, नागपुरी, खोरठा, कुरमाली, पंच परगनियाँ इसी परिवार से सम्बन्ध रखती हैं। मुण्डाओं ने नागवंशी की स्थापना में अपना योगदान दिया। 1000 ईसा पूर्व तक चेरो- खरवारों तथा सन्तालों को छोड़कर यहाँ मौजूद सभी जातियाँ बस चुकी थीं। पूर्व मध्यकाल में हजारीबाग में सन्ताल तथा पलामू में चेरो- खरवार आकर बसे। इसके बाद अंग्रेजों ने फिर दामिन-ई-कोह में पहाड़िया जनजाति से निपटने के लिए हजारीबाग से सन्तालियों को बसाना शुरू किया और 1820 ईसवी तक काफी संख्या में इनकी आबादी हो चुकी थी। 1855 के महान हूल के बाद इस इलाके का नाम ही सन्ताल परगना हो गया। मध्यकाल से लेकर ब्रिटिश काल का इतिहास अज्ञात नहीं है। इसी दौर में नागवंश को छोड़ कई राजवंश भी दिखाई पड़ने लगे। कम्पनी और फिर ब्रिटिश सत्ता के साथ यहाँ विद्रोह भी शुरू हुए। तिलका माँझी से लेकर बिरसा मुण्डा तक संघर्ष की एक लम्बी दुखभरी कहानी है।
सभ्यता का इतिहास दरअसल, यात्रा का इतिहास है। यहाँ सब कुछ चलायमान है। हवा, नदी, चाँद, सूरज, तारे और यहाँ तक कि धरती भी। चलना जीवन है, रुकना अन्त। दुनिया का इतिहास यात्राओं ने बदला है। यात्राओं से ही दुनिया को भी समझ सके हैं। हम जो भी कुछ आज दुनिया के प्राचीन इतिहास को देखते-समझते हैं, उसमें यायावरों का महत्त्वपूर्ण योगदान है। कनिंघम का एक बड़ा काम इसलिए सम्भव हो सका कि उसके सामने सातवीं शताब्दी के ह्वेनसांग का यात्रा विवरण था। आदि शंकराचार्य ने पैदल ही देश को नाप लिया था। भारतीय परम्परा में तीर्थ यात्रा का आरम्भ अपने देश के धर्म-संस्कृति, समाज, लोग, भाषा को जानने के लिए ही हुआ। हर बारह साल व छह साल पर कुम्भ का लगना और देश भर के लोगों का यहाँ आना सिर्फ़ धार्मिक कर्मकाण्ड का निमित्त नहीं है। हमारे इतिहास का सर्वाधिक विश्वसनीय स्रोत तो यायावरों की किताबें हैं। राहुल ने कम यात्राएँ नहीं कीं। मध्यकाल में भी कितने यात्री आये और भारत के बारे में लिखा। अंग्रेज़ों के काल में भी घुमक्कड़ आते रहे। ब्रिटिश काल में हज़ारों किताबें भारत पर लिखी गयी मिलती हैं। 1916 में मण्डला राजा के साथ गोपालराम गहमरी ने श्रीलंका की यात्रा की थी। तो अपने नवजागरण के अग्रदूत भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने काशी नरेश के साथ बाबा बैजनाथ धाम की यात्रा की थी। वे काशी से देवघर आये और अपनी यात्रा के बारे में लिखा।
– इसी पुस्तक से
”
| Weight | 0.5 kg |
|---|---|
| Dimensions | 22.59 × 14.34 × 1.82 cm |
| Author | Edited by Sanjay Krishan (सम्पादक : संजय कृष्ण ) |
| Language | hindi |
| Publisher | Vani Prakashan |
| Pages | 152 |
| Year/Edtion | 2025 |
| Subject | Memoirs/Travelogue |
| Contents | N/A |
| About Author | "संजय कृष्ण |















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