” परसाई एक खतरनाक लेखक हैं, खतरनाक इस अर्थ में कि उन्हें पढ़कर हम ठीक वैसे ही नहीं रह जाते जैसे उनको पढ़ने के लिए होते हैं। वे पिछले तीस वर्षों के हमारे राजनीतिक-सांस्कृतिक जीवन के यथार्थ के इतिहासकार हैं। स्वतंत्राता के बाद हमारे जीवनमूल्यों के विघटन का इतिहास जब भी लिखा जाएगा तो परसाई का साहित्य सन्दर्भ-सामग्री का काम करेगा। उन्होंने अपने लिए व्यंग्य की विधा चुनी, क्योंकि वे जानते हैं कि समसामयिक जीवन की व्याख्या, उसका विश्लेषण और उसकी भत्र्सना एवं विडम्बना के लिए व्यंग्य से बड़ा कारगर हथियार और दूसरा नहीं हो सकता।
व्यंग्य की सबसे बड़ी विशेषता उसकी तात्कालिकता और सन्दर्भों से उसका लगाव है। जो आलोचक शाश्वत साहित्य की बात करते हैं उनकी दृष्टि में व्यंग्य पत्राकारिता के दर्जे की वस्तु मान लिया गया है। और उन्हें लगता है कि साहित्यकार व्यंग्य का उपयोग चटखारेबाजी के लिए भले ही कर ले, किसी गम्भीर लक्ष्य के लिए उसका उपयोग नहीं किया जा सकता है। ऐसे विचारकों ने साहित्य के लिए जो आदर्श स्वीकृत कर रखे हैं, व्यंग्य उनकी धज्जियाँ उड़ाता है। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं कि व्यंग्य लेखक ऐसे मर्यादावादियों की दृष्टि में हलका लेखक, सड़कछाप लेखक या फनी लेखक होता है। व्यंग्य को साहित्य की ‘शेड्यूल्ड-कास्ट’ विधा मान लिया गया है, पर कबीर को भी इन मर्यादावादी विचारकों ने कवि मानने से परहेज़ करना चाहा था। ”
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Mati Kahe Kumhar Se (माटी कहे कुम्हार से )
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| Weight | 0.5 kg |
|---|---|
| Dimensions | 22.59 × 14.34 × 1.82 cm |
| Author | Harishankar Parsai (हरिशंकर परसाई) |
| Language | Hindi |
| Publisher | Vani Prakashan |
| Pages | 180 |
| Year/Edtion | 2014 |
| Subject | Satire |
| Contents | N/A |
| About Athor | N/A |
















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