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Kitne Kathghare (कितने कठघरे)

Original price was: ₹475.00.Current price is: ₹308.00.

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“कितने कठघरे –
गहरी संवेदना में ऊभचूभ करता रजनी गुप्त का यह नया उपन्यास पाठकों को अस्थिर कर देता है। एक समय था जब चीज़ें स्याह और उजले परिप्रेक्ष्य में बेहिचक देखी जा सकती थी परन्तु अब नहीं। पाठक रत्ना से अलग होकर भी असम्पृक्त हो उठता है। कमाल है न। जैसा उपन्यासकार चाहता है, पाठक का चाहना भी वही हो उठता है। जेल के भीतर स्त्रियों की ज़िन्दगियाँ क्या हैं और क्यों हैं, ये दो अहम सवाल मुख्य धारा से टकराते हैं। इनके प्रति देखने का नज़रिया बदलने की उपन्यास में जो मशक़्क़त की गयी है, वह कथाकार को एक एक्टिविस्ट की भूमिका में लाकर खड़ा कर देता है। वांछा की उपस्थिति बड़ी सकारात्मक ऊर्जा देती है। उपन्यास में तेज़ी से घटती हुई घटनाएँ और बदलते दृश्य भी अपने में इतना पैनापन लिए हुए हैं कि उनकी धार पाठक के मस्तिष्क में अपनी स्मृति सुरक्षित कर लेती है। कथा के केन्द्र में रत्ना है, अविकसित मस्तिष्क वाले पति के पल्ले से बँधी। रत्ना जिस तरह की राह चुनती है, दरअसल वह ऐसी मृगमरीचिका है जहाँ हज़ारों रत्ना जैसी स्त्रियों को भरे पात्र होने का अहसास देकर छला जाता है। ‘कितने कठघरे’ रजनी गुप्त का उपन्यास तथाकथित अपराध को झेलती स्त्रियों के लिए लोकतन्त्र के भीतर के सत्य अलीगार्की (अत्पतन्त्र) पर उँगली रखता है। एक और उल्लेखनीय बात, इस उपन्यास में भारतीय जेलों में रहती बन्दिनियों की बदहाल दशा पर समाजशास्त्रीय नज़रिये से भी विश्लेषण किया गया है। हिन्दी जगत में इस नयी बीम पर आधृत यह उपन्यास विशाल पाठक वर्ग की अन्तस्वली तक पहुँचकर उनकी सोच व संवेदना संसार में नये सिरे से हलचल मचायेगा, ऐसा विश्वास है।
-शशिकला राय

Author

Weight 0.5 kg
Dimensions 22.59 × 14.34 × 1.82 cm
Author

Rajni Gupt (रजनी गुप्त)

Language

Hindi

Publisher

Vani Prakashan

Pages

216

Year/Edtion

2015

Subject

Novel / Feminism

Contents

N/A

About Athor

"रजनी गुप्त –
जन्म : 02 अप्रैल, 1963, चिरगाँव, झाँसी (उ.प्र.)।
शिक्षा : एम.फिल., पीएच.डी., जे.एन.यू., नयी दिल्ली।
रचनाएँ : कहीं कुछ और, किशोरी का आसमाँ, एक न एक दिन, कुल जमा बीस, ये आम रास्ता नहीं (उपन्यास); एक नयी सुबह, हाट बाज़ार, अस्ताचल की धूप, प्रेम सम्बन्धों की कहानियाँ (कहानी-संग्रह); सुनो तो सही (स्त्री विमर्श)।
सम्पादन : आज़ाद औरत कितनी आजाद; मुस्कराती औरतें, आख़िर क्यों लिखती हैं स्त्रियाँ।
विशेष : 'कहीं कुछ और' राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन ओपन यूनिवर्सिटी के स्त्री विमर्श पाठ्यक्रम में शामिल एवं 'स्त्री घर' (डायरी विधा) औरंगाबाद विश्वविद्यालय के बी.ए. के कोर्स में शामिल।
'सुनो तो सही' हिन्दी साहित्य के इतिहास में शामिल।
कथाक्रम (साहित्यिक पत्रिका) में पिछले एक दशकसे सम्पादकीय सहयोग।
पुरस्कार/सम्मान : युवा लेखन सर्जना पुरस्कार (उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा) 2002; आर्यस्मृति साहित्य सम्मान (किताब घर प्रकाशन) 2006; किशोरी का आसमाँ पर अमृत लाल नागर पुरस्कार 2008; क़लमकार फाउंडेशन द्वारा अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता में द्वितीय पुरस्कार, 2014।
"

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