एक बुरी औरत की आत्मकथा से हिन्दी जगत में अपनी विशेष पहचान बनाये वाली पाकिस्तानी लेखिका किश्वर नाहिद का सम्बन्ध दरअसल उर्दू शायरी से रहा है। जीवन में संघर्ष और नैतिक दृष्टिकोण की वकालत करने वाली किश्वर ने जब अपने अहसास शायरी में बयाँ किये तो उर्दू शायरी में जैसे ज़लज़ला आ गया। ये वही समय था जब पाकिस्तान में जनरल ज़िया-उल-हक़ के फ़ौजी शासन का डंडा आम जनता के जीवन को त्रस्त कर रहा था। इसी समय में जब फ़हमीदा रियाज़, परवीन शाकिर, समीना राजा, शारा शगुफ़्ता और किश्वर नाहिद जैसी बेवाक महिला साहित्यकारों ने पाकिस्तानी शायरी के फलक पर दस्तक दी। इनके सबके अलग-अलग तेवर थे लेकिन एक बात सबमें समान थी कि सभी को अपने विषय की बोल्डनेस के साथ लगातार पाकिस्तान के संकुचित पुरुष सत्तात्मक साम्राज्य को चुनौती दे रही थी। किश्वर उर्दू शायरी में अपने समस्त बाग़ीना तेवर के सामने आयीं और देखते ही देखते ये बाग़ी तेवर उन लोगों के लिए राहत और सुकून का पैग़ाम लेकर आये जो एक घुटन भरी ज़िन्दगी से बाहर निकलने को बेताब थे। किश्वर प्रतीकों में नहीं जीतीं बल्कि ये बाग़ियाना बुरी औरत उनकी शायरी में आसानी से देखी जा सकती है जो धर्म, समाज, सत्ता, राजनीति से बेखौफ़ होकर युद्ध लड़ रही है और उसे किसी भी अच्छे-बुरे परिणाम की प्रतीक्षा नहीं है।
| Weight | 0.5 kg |
|---|---|
| Dimensions | 22.59 × 14.34 × 1.82 cm |
| Author | Kishwar Naheed Translated by Pradeep 'Sahil' (प्रदीप 'साहिल' द्वारा अनुवादित किश्वर नाहिद) |
| Language | Hindi |
| Publisher | Vani Prakashan |
| Pages | 88 |
| Year/Edtion | 2008 |
| Subject | Ghazal |
| Contents | N/A |
| About Athor | "किश्वर नाहिद " |














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