“हिन्दी संक्षिप्त लेखन –
मनुष्य विचारशील प्राणी है, वह सामाजिक जीवन में प्रतिक्षण अपने विचारों को व्यक्त किया करता है। विचारों की अभिव्यक्ति के साथ ही साथ उसे दूसरे लोगों के विचारों तथा मान्यताओं आदि का भी ध्यान रखना पड़ता है।
सामाजिक जीवन का ज्यों-ज्यों विकास होता जाता है उसी ढंग पर उपचार, शिष्टाचार तथा व्यवहार का भी विकास होता रहता है। इन सबका उचित रूप में पालन न करना अपने आप को अशिष्ट एवं असभ्य घोषित करना है।
उपर्युक्त विभिन्नता के कारण ही एक बात को पृथक्-पृथक् ढंग से कहा जा सकता है-एक में निवेदन है तो अन्य में प्रार्थना; किसी-किसी व्यक्ति के प्रति स्नेहपूर्ण आदेश रहता है तो कहीं-कहीं मार्मिक व्यंग्य-तथापि मूल में एक ही विचारधारा अन्तर्निहित रहती है। सभ्यता, शिष्टाचार का गहन आवरण वास्तविक बात को इस प्रकार आच्छादित-सा कर लेता है कि लोग कृत्रिम रूप की विविधता को ही सत्य मानने लगते हैं। उदाहरण के लिए एक निमन्त्रण पत्र को ही लेते हैं—जब कोई किसी सम्माननीय व्यक्ति को आमन्त्रित करना चाहता है तो उसके पत्र में अनन्त दैन्य एवं आभार-प्रदर्शन रहता है, वही आदमी अपने छोटे भाई को जब किसी उत्सव अथवा समारोह की सूचना देता है तो उसमें एक प्रकार की आज्ञा-सी रहती है। मित्र के पत्र में भाषा तथा कहने के ढंग में स्नेह, विश्वास तथा आत्मीयता की दिव्य आभा व्याप्त रहती है।
अस्तु, यह स्पष्ट है कि सामाजिक जीवन तथा व्यक्ति के दैनिक व्यवहार से मूल बात के साथ ही साथ भाषा, व्यवहार, शिष्टाचार के विभिन्न रूप भी अभिव्यक्त होते हैं। इन सब का आडम्बर लेख और कथन में अत्यधिक विस्तार कर देता है—ऐसा पत्रों, भाषणों एवं वक्तव्यों में नित्य- प्रति दिखाई पड़ता है।
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| Weight | 0.5 kg |
|---|---|
| Dimensions | 22.59 × 14.34 × 1.82 cm |
| Author | Ramprasad Kichlu (रामप्रसाद किचलू ) |
| Language | Hindi |
| Publisher | Vani Prakashan |
| Pages | 116 |
| Year/Edtion | 2011 |
| Subject | Linguistics |
| Contents | N/A |
| About Athor | "राम प्रसाद किचलू – " |














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