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Trilochan Ka Kavi Karm (त्रिलोचन का कवि कर्म )

Original price was: ₹300.00.Current price is: ₹195.00.

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“त्रिलोचन का कवि कर्म –
त्रिलोचन का कवि कर्म एक सक्रिय दर्शन का पाठ है। जब ‘तारसप्तक’ की इतिहास में तैयारी की जा रही थी, कवि त्रिलोचन अवध के गाँव से राजस्थान तक लोक कला की खोज कर रहा था। धरती और सप्तक की परम्पराओं में इसी नाते कई विरोधी कवि थे पर त्रिलोचन जनतन्त्र के कवि बाल्ट हिटमन से अमिषा के आदि कवि वाल्मीकि से संवाद कर रहा था। उसके संस्कार सक्रिय दर्शन के संस्कार थे।
विष्णुचन्द्र शर्मा ने 1950 में काशी में तुलसीदास के ‘स्थान’ की खोज की थी उसी समय लेखक ने देखा था ‘त्रिलोचन का अपनापन’। फिर दोनों काशी के घाट में घुमते हुए अपने दौर के कवियों पर, उनके प्रेम और सौन्दर्य की मान्यताओं पर बहस करने लगे थे।
आज जब त्रिलोचन नहीं हैं तो कविता के दो फाँक साफ़-साफ़ नजर आ रहे हैं एक ओर हैं- निराला से त्रिलोचन तक के सक्रिय दर्शन के कवि दूसरी ओर है पश्चिम से उधार ली हुई निष्क्रिय दर्शन की कविता। त्रिलोचन की पहचान शमशेर, मुक्तिबोध ने सक्रिय दर्शन के कवि के रूप में, तब की थी जब हिन्दी पर पश्चिम की ‘आधुनिकता’ का दबदबा था। जनपद या पक्षधर कवि नागार्जुन, त्रिलोचन, केदारनाथ अग्रवाल और मुक्तिबोध को उस दबदबे में भुला दिया गया था। केदारनाथ अग्रवाल ने तभी लिखा था क्रान्ति मेरी जीवनी है। प्रगतिशील कविता की यही कहानी त्रिलोचन की जनता की कहानी है जिसे उसने ‘पर्वत की दुहिता’ कहा था। महाकुम्भ में है आदिकवि से राम की शक्ति तक की परम्परा उसी परम्परा का लघुतम महाकाव्य है महाकुम्भ यहाँ है सक्रिय दर्शन के कवि त्रिलोचन का एक बिम्ब इस सक्रिय दर्शन का सूत्र है किसी देश या राष्ट्र की कभी नहीं जनता मरती है।
विष्णुचन्द्र शर्मा ने किंवदती पुरुष कहे जाने वालों से यहाँ प्रश्न पूछा है इस पुस्तक में त्रिलोचन के बाद की विडम्बना पर बहस की है। युद्धकाण्ड के महाकवि वाल्मीकि के साथ त्रिलोचन ने अभिधाशैली को पहचाना है। उनके प्रगतिशील द्वन्द्ववाद पर आत्मीय स्तर पर विचार किया है। आत्मीय स्तर पर है यहाँ संस्मरण, पत्र और राजत्व से किसानी तक की कहानी।
स्व. शिवचन्द्र शर्मा ने ‘स्थापना’ के तीन खण्ड त्रिलोचन पर निकाल कर इस कहानी की शुरुआत की थी। शमशेर ने ‘वेल’ कविता लिखकर अपने प्रिवकवि की क्लासिक परम्परा को विकसित किया था। विष्णुचन्द्र शर्मा ने कवि (1957) में त्रिलोचन की श्रेष्ठता पर बहस आयोजित की थी। त्रिलोचन का कवि कर्म इसी नाते आज की कविता की कसौटी है।

Author

Weight 0.5 kg
Dimensions 22.59 × 14.34 × 1.82 cm
Author

Vishnuchandra Sharma (विष्णुचन्द्र शर्मा)

Language

Hindi

Publisher

Vani Prakashan

Pages

162

Year/Edtion

2010

Subject

Criticism

Contents

N/A

About Athor

"
विष्णुचन्द्र शर्मा –
जन्म : 1 अप्रैल, 1933।
विष्णुचन्द्र शर्मा प्रेमचन्द की काशी के लेखक हैं। लोकपक्ष की मान्यताओं पर उन्होंने लगातार बहस की है। निराला की निराशा के बाद उन्होंने त्रिलोचन के आशावाद को देखा-परखा है कवि (1957) और सर्वनाम (2009) तक में नागार्जुन।
एक लम्बी जिरह उसी मुठभेड़ का लोकपक्ष बताती है। कबीर क्या कभी मठाधीश थे? यह सवाल पूछते हुए विष्णुचन्द्र शर्मा ने 'कबीर की डायरी' लिखी है। भगत सिंह के बाद क्या वैदिक मानवतावाद के प्रवक्ता रामविलास शर्मा क्रान्तिकारी थे। ऐसे सीधे सवाल पूछने की लोकायत दर्शन की परम्परा के विष्णुचन्द्र शर्मा प्रवक्ता रहे हैं। वह राहुल सांकृत्यायन के समय साम्यवादी दौर के हिस्सेदार मार्क्सवादी रहे हैं।
एक घुमक्कड़ कवि के नाते वह अभी पेरिस (फ्रांस), न्यू यॉर्क, वाशिंग्टन, लास एंजिलस, ब्यूस्टन (अमेरिका), मैक्सिको और बर्लिन (जर्मनी) घूम कर आये हैं। चार मास की यह यात्रा, एक कवि की यात्रा है, जिसमें उन्होंने दो कविता संग्रह तैयार किये हैं : मेरा एक बिम्ब बचा है, दूसरा थिएटर हम है।
घुमक्कड़ी के बीच में वह लगातार अपने समय की पतनशील सभ्यता से टकराते रहे हैं। विडम्बना उपन्यास इसी इतिहास से संवाद की कथा है। अपने बेगाने उपन्यास में वह यूरोप और भारत की संवेदना की खोज करते हैं। चलत-चलत पैंजनिया टूटी उपन्यास में उसी यात्रा की कहानी इन्होंने लिखी है।
जब एक पात्र उनकी जीवन यात्रा में आता है और वह उसे अपना पोस्टर और दोगले सपने की कहानियों में उतार देते हैं। धीरज का रथ (काव्य रूपक) में वह तुलसीदास की त्रासदी को रचते हैं। अन्त की शुरुआत और बेज़ुबान नाटकों में वह पतनशील भारतीय सभ्यता का चित्रण करते हैं।
"

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