“सामाजिक संस्कृति के समाज में साम्प्रदायिक विरूपताओं की जटिलता ही इस उपन्यास का विषय है, जो अन्त में अनन्त सिद्दीकी के गले में पड़े ‘तावीज़’ के खुलने से उजागर होता है। हिन्दू और मुस्लिम दोनों धाराएँ किस तरह एकमेक और किस तरह एक-दूसरे की जानलेवा हो जाती हैं – यही ‘तावीज़’ का विन्यास है। भीषण दंगे की चपेट में मुस्लिम पति को खोकर रेवा फिर से अपने बेटे के साथ दूसरे हिन्दू पति महेश के घर में प्रवेश करती है और यहाँ फिर सम्बन्धों का दंगा शुरू हो जाता है।
कथाकार शीला रोहेकर का ‘दिनान्त’ के बाद यह दूसरा उपन्यास है, जो सीधा अपने संवेदनशील मुहावरे में समाज की अंतःक्रियाओं में प्रवेश करता है। इसमें पिछली दो सदियां और अहमदाबाद, लखनऊ और अयोध्या की जिंदगी और उसकी विडम्बनाएँ समाहित हैं। लगातार चाकू की धार पर चलती हुई-सी । दरारों को छिपाती नहीं। दरारों को देखती – दिखाती हुई ।
अपने समाज में यह परिवार और समुदाय की इकाइयों के टूटने या उनके स्वयंभू हो जाने का समय है। ‘तावीज़’ हिन्दू-मुसलमान के आन्तरिक सम्बन्धों के गहरे दस्तावेज़ के रूप में विकसित होता है, जिसका चरम बिन्दु बाबरी मस्जिद विध्वंस है जिसमें अनंत सिद्दीकी कार सेवा करता है और मारा जाता है। अनंत सिद्दीकी की अस्मिता संदिग्ध है। उसके अपने भीतर भी। इसी खोज की त्रासदी का अंत उसकी मौत में होता है। इसे बाबरी मस्जिद विध्वंस का रूपक भी कह सकते हैं। ‘तावीज़’ इतिहास की समकालीनता रेखांकित करता है।
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