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Subhana Aur Anya Kahaniyan (सुभाना और अन्य कहानियाँ)

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सत्यवती मलिक की कहानियाँ भाषिक संरचना की दृष्टि से हिन्दी की आरम्भिक आधुनिक कहानियाँ कही जाएँगी। इसलिए भी कि उनमें बृज या अवधी या पूर्वीय लोक बोलियों की सरसता की जगह पंजाबी या कश्मीरी लोकवृत्त की उदारता लक्षित होती है । उनमें स्पष्टता, बेबाकपन और स्वच्छन्दता की ऐसी भावलहरी प्रतिबिम्बित होती है जो उन कथाओं को मुख्यधारा की समानान्तरता प्रकट करती है। बीसवीं शताब्दी में विषयों के वैविध्य से सम्पन्न कथाकारों ने ही नयी कथाप्रवृत्तियों की शुरुआत की है। सत्यवती मलिक की कथाओं की मुख्य कथाभूमि भारतीय समाज में परिवार का बहुविध महत्त्व तो प्रतिपादित करती ही है किन्तु वे अपने अन्तर्निहित संकेतों में उन तमाम समस्याओं की ओर भी इंगित करती हैं जिन्होंने दासता की यथास्थिति को मजबूत किया है। उनकी कहानियों में प्रकृति के साथ उनका आत्मिक सम्बन्ध व ऐसे भारतीय संस्कार का वातावरण देखने को मिलता है जिसमें स्त्रियों के प्रति मार्मिकता और संवेदनशीलता विशेष रूप से झलकती है। इस क्षेत्र में भी सत्यवती मलिक के योगदान की उपेक्षा नहीं की जा सकती क्योंकि स्वाधीनता संग्राम के मोर्चे पर वे कलम के सिपाहियों की सेना का प्रतिनिधित्व करती दिखाई देती हैं।

Author

Weight 0.5 kg
Dimensions 22.59 × 14.34 × 1.82 cm
Author

Satyavati Malik (सत्यवती मलिक)

Language

Hindi

Publisher

Vani Prakashan

Pages

140

Year/Edtion

2014

Subject

Collection of Stories

Contents

N/A

About Athor

"सत्यवती मलिक

स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय सत्यवती मलिक का जन्म कश्मीर में हुआ था। यहीं पर उनकी माता देवकी साहनी ने सबसे पहली धर्मनिरपेक्ष पुत्री पाठशाला की स्थापना कर महिलाओं को शिक्षित करने का क्रान्तिकारी कार्य किया था। सत्यवती जी के पिता का घर बुद्धिजीवियों का केन्द्र हुआ करता था। उनके यहाँ भारत के सभी प्रमुख राजनीतिज्ञ, जैसे जवाहर लाल नेहरू, अब्दुल गफ़्फ़ार खाँ, बौद्ध विचारक भदन्त आनन्द कौसल्यायन सहज महसूस करते थे। ऐसी ही गहमागहमी सत्यवती जी के कलकत्ते वाले घर में देखी जाती थी। 'विशाल 'भारत' के सम्पादक बनारसीदास चतुर्वेदी और अन्य अनेक स्वाधीनता संग्राम सेनानी उनके घर को अपनत्व का बसेरा समझते थे। ऐसे सुधी विद्वानों में शान्तिनिकेतन में कार्यरत पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी भी थे। साथ ही साथ प्रख्यात कलाकारों यथा नन्दलाल बोस, सुधीर खास्तगीर, शान्ति घोष से सत्यवती जी का घना अपनापा था।

दिल्ली का उनका निवास स्थान तो एक बेजोड़ बसेरा था, जहाँ सुमित्रानन्दन पन्त, सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला, हरिवंश राय बच्चन, शिवमंगल सिंह 'सुमन', अज्ञेय आदि लेखक बराबर मिलते और नव साहित्य की गतिविधियों पर चर्चा व संवाद करते थे।

दिल्ली में ही बनारसीदास चतुर्वेदी और जैनेन्द्र के साथ सत्यवती जी ने हिन्दी भवन की स्थापना में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

सत्यवती जी साहित्य, संगीत और कला के प्रति समान भाव से समर्पित थीं । गन्धर्व महाविद्यालय और सरस्वती समाज के कार्यों के प्रति उनकी निष्ठा अतुलनीय कही जाएगी। भारत में महिला उत्थान के लिए उनकी माता जी ने जो शुरुआत की थी उसकी परम्परा का निर्वहन सत्यवती जी आजीवन करती रहीं। उन्होंने अनेक संस्थाओं की नींव रखी जो शिक्षा, नृत्य, संगीत व कला के लिए जानी जाती हैं। पर्यावरण, सामाजिक समरसता, मानवीय संवेदनशीलता के दर्पण में उनकी रचनात्मक कविताएँ व कहानियाँ झिलमिलाती हैं। वे सदैव ऐसी अग्रणी लेखिका रही हैं जिन्होंने अपनी कहानियों के बल पर हिन्दी साहित्य में अपना अलग स्थान बनाया है।"

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