| सन्नाटे में अलाव – जो जानते हैं वे शुरू से ही जानते रहे हैं कि अजीत चौधरी हिन्दी कविता के लगातार वैविध्यपूर्ण होते जा रहे परिदृश्य में भी एक अनूठे कवि है। बहुत सारे अलग-अलग कवियों में भी इतने अलग कि कभी-कभी लगता है कि उन्होंने जान-बूझकर अपना एकांत कोना पकड़ लिया है ताकि अपने ढंग की कविता बेपरवाह निर्विघ्न लिखते रह सकें। उनके यहाँ दोहरी उत्कटता है। ये जितनी बारीकी और गहराई से अपने आसपास को देखते हैं उतनी ही संजीदगी से अपने दिल-ओ-दिमाग़ के भीतर भी जाते हैं। हिन्दी में ऐसे पर्याप्त प्रौढ़ और युवा कवि होंगे जिनमें इन दो ध्रुवान्तों को साधने की कुब्बत तो है लेकिन वह दोनों में से एक से कन्नी काट जाते हैं किसी को बाहर से परहेज़ है तो कोई अन्दर उतरने से बचना चाहता है। इन्हीं दिनों में यदि अजीत चौधरी अन्न पर लिखते हैं तो कहीं और उन्हें यह स्वीकार करने में कोई दिक़्क़त नहीं होती कि चाँदनी को गाता हूँ। यदि सालिम अली की जीवित या लुप्त होती हुई पक्षी प्रजातियाँ उनका विषय हैं तो जगदीश स्वामीनाथन के कैन्स की चिड़िया को बहुत लम्बे, बहुत नीले खेत में ज्यों प्रार्थना हो अन्न की सरीखे अद्वितीय ढंग से देखते हैं। प्रभु जोशी की कहानियों और नवीन सागर की कविताओं में नहीं, उनके बनाये हुए चित्रों में अजीत चौधरी अपने लिए अर्थ और संकेत खोज लेते हैं। वे भीड़ में पहचान बनाने की हिंसा में शामिल नहीं और उनमें यह कहने का साहस है कि मेरा पता दूसरों के सन्दर्भों से है। भूल चुका हूँ अपना पता, अकेला होना यदि उनके लिए कभी संगीत है तो वे एक इकाई भी हैं जो धरती पर अपनी आवाज़ ढूँढ़ती है। जो उन्हें लगता है कि वह किसी चीख़ की शक्ल में पहचानी जायेगी। जो आदमी होने की निशानी है अकेला होता हूँ/उसी चीख़ के साथ दुनिया में होने की जगह बनाता हुआ किन्तु वे यह ताक़ीद भी करते हैं कि उनके लिए कोई प्रार्थना न की जाये। आज की महाजनी सभ्यता की सर्वव्याप्ति जानते हुए, जिसमें डरे हुए लोग घरों से होकर रास्ता देते हैं बाज़ार लगाने की जगह देते हैं, अजीत चौधरी की ज़िद है कि वे शहर के नहीं, गाँव-गाँव के कवि हैं। उन्होंने अपना ही जीवन दाँव पर लगाया है। वे सब ओर से खुले हुए बन्द के, बहुत बड़े दुःख की विनत छाँव के कवि हैं। उनकी कविता में घर की बहुत-सी स्मृतियाँ हैं। वे बचपन और पाठशाला को लौटते हैं जहाँ वे स्लेट पर बनी उड़ानहीन चिड़िया को जब पोखर में धोते हैं तो वह जीवित मछली में बदल जाती है। ‘अन्न’ और ‘पसीना’ उनके प्रिय शब्द हैं। दाख़िल-ख़ारिज में एक पूरा जीवन पटवारी की खतौनी है किन्तु ‘हवि’, ‘पितर’, ‘सन्चास’, ‘ऋचा’, ‘जागरण’, ‘आह्वान’, ‘कुलदेवता’ तथा ‘ग्रामदेवता’ आदि की उपस्थिति उनकी कविता की अप्रगल्भ सांस्कृतिक चेतना को भी रेखांकित करती है। अजीत चौधरी मूलतः समूचे जीवन के कवि हैं किन्तु वे जानते हैं कि मृत्यु कई जन्मान्तरों में प्रतीक्षारत मिलती है और उसे अपनी यात्रा का एक मील का पत्थर मान लेना बहुत ज़्यादा ग़लत न होगा। |
| author | Ajeet Choudhary (अजीत चौधरी) |
|---|---|
| publisher | Vani Prakashan |
| language | Hindi |
| pages | 106 |












