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Sabhyata Se Samvad Bharat Ko Phir Se Khojate Hue (सभ्यता से संवाद भारत को फिर खोजते हुए)

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“सभ्यता से संवाद : भारत को फिर खोजते हुए

पश्चिमी उपनिवेशक कभी अपना अतीत नहीं देखते थे। वे सिर्फ दक्षिण अमेरिका, एशिया, अफ्रीका और आस्ट्रेलिया में बसे पुराने निवासियों को असभ्य कहते थे। ये घुमा-फिरा कर आलसी, हिंसक और अविश्वसनीय समझे जाते थे। ऐसा माना जाता था कि इन निवासियों में अपनी भूमि को विकसित करने की बौद्धिक क्षमता नहीं है। ये अपनी भूमि का इस्तेमाल नहीं करते हैं, इसलिए इसे अपने पास रखने का इन्हें हक नहीं है। यूरोप के साम्राज्यवादियों ने अपने आक्रमणों, विजयों और विनाशलीलाओं को यही सब कहकर औचित्य प्रदान किया था। यह भी कहा गया कि उपनिवेशित देशों के प्राचीन निवासियों को भौतिक और सांस्कृतिक उन्मूलन का दर्द झेलना पड़ा, क्योंकि यूरोप में पूँजीवाद के उत्थान ने इन्हें उत्पादन की पूँजीवादी पद्धति को अंगीकार करने के लिए बाध्य कर दिया। इसके अलावा, धार्मिक रास्ते से भी तर्क आया कि सभ्यता के प्रचार के लिए प्राचीन निवासियों, बर्वरों या पिछड़ों का ईसाईकरण जरूरी है। उनके ‘सभ्यता के मिशन’ और नस्लवाद के बीच फर्क नहीं बचा था । जाहिर है, इन्हीं संदर्भों में ‘ह्वाइटमैन्स बर्डन’ का यूरोपीय अहंकार सामने आया था, जो परिवर्तित रूप में अब ‘सभ्यताओं की टकराहट ‘ है। उस अहंकार का नया रूप है अमेरिकी वर्चस्व का औचित्य सिद्ध करते हुए यह कहा जाना कि अमेरिका ही मुक्त बाजार, मानवाधिकार और लोकतंत्र का अभिभावक है।

Author

Weight 0.5 kg
Dimensions 22.59 × 14.34 × 1.82 cm
Author

Sambhunath (शंभुनाथ)

Language

Hindi

Publisher

Vani Prakashan

Pages

222

Year/Edtion

2008

Subject

Criticism

Contents

N/A

About Athor

"शंभुनाथ

जन्म : 21 मई, 1948, हिन्दी विभाग, कलकत्ता विश्वविद्यालय में 1979 से अध्यापन । सम्प्रति केन्द्रीय हिन्दी संस्थान के निदेशक । आलोचना की किताबें : साहित्य और जन-संघर्ष (1980), तीसरा यथार्थ (1984), मिथक और आधुनिक कविता (1988), रामचन्द्र शुक्ल और बौद्धिक उपनिवेशवाद की चुनौती (1888), दूसरे नवजागरण की ओर (1993), धर्म का दुखान्त (2000), संस्कृति की उत्तरकथा (2000), दुस्समय में साहित्य (2002), हिन्दी नवजागरण और संस्कृति (2004)।

सम्पादन ः मिथक और भाषा (1980), भारतेन्दु और भारतीय नवजागरण (1986), राष्ट्रीय मुक्ति आन्दोलन और प्रसाद (1989), राहुल सांकृत्यायन : अन्तर्विरोधों में लय (1991), हिन्दी में नवजागरण ः बंगीय विरासत (दो खंडों में 1993), आधुनिकता की पुनर्व्याख्या (2002), सामाजिक क्रान्ति के दस्तावेज़ (दो खंडों में, 2004)"

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