नक्सल आन्दोलन की निरर्थक पड़ने की व्यथा-कथा बयान करता है। नक्सल आन्दोलन छोड़कर, चन्द नौजवान दुनिया बदलने निकल पड़ते हैं। उन सबको हत्या के झूठे आरोप में जेल में ढूंस दिया जाता है। 18 वर्ष बाद, जब वे लोग जेल से रिहा होकर गाँव लौटते हैं, तब तक नक्सल आन्दोलन की जगह, पुलिस के मुखबिर ही, अब गाँव के मस्तान, धनी, क्षमताशील और सर्वेसर्वा नज़र आते हैं। उन लोगों के पैरों तले ज़मीन प्रदान करते हुए, गाँव का एक संवेदनशील अधेड़ इन्सान, अपनी बन्द प्रेस उन लोगों के हवाले कर देता है। मगर हद तो तब होती है जब उस प्रेस को भी आग के हवाले कर दिया जाता है। कई साथी मारे जाते हैं। ऐसे में कथा-नायक, सीधे गाँव के उस मस्तान के घर पहुँचता है और उसका क़त्ल कर देता है। समाज में फैली नाइन्साफ़ी, अत्याचार और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़, वह चरम क़दम उठाता है। बिना कोई हत्या किये, वह 18 सालों की जेल की सज़ा झेल चुका था। अब सचमुच हत्या करके आत्मसमर्पण कर देता है। नक्सल आन्दोलन, साहसिकता, बिखराव और बेनिशान होने की त्रासदी झेलनेवाले नौजवानों की कथा है। विविध क्षेत्रों की अलग-अलग तस्वीर पेश करती हुई, महाश्वेता की सशक्त लेखनी, लेखन-कर्म की प्रतिबद्धता को उजागर करती है।
| Weight | 0.5 kg |
|---|---|
| Dimensions | 22.59 × 14.34 × 1.82 cm |
| Author | Mahasweta Devi (महाश्वेता देवी) |
| Language | Hindi |
| Publisher | Vani Prakashan |
| Pages | 100 |
| Year/Edtion | 2010 |
| Subject | Novel |
| Contents | N/A |
| About Athor | बांग्ला की प्रख्यात लेखिका महाश्वेता देवी का जन्म 1926 में ढाका में हुआ। वह वर्षों बिहार और बंगाल के घने कबाइली इलाकों में रही हैं। उन्होंने अपनी रचनाओं में इन क्षेत्रों के अनुभव को अत्यन्त प्रामाणिकता के साथ उभारा है।महाश्वेता देवी एक थीम से दूसरी थीम के बीच भटकती नहीं हैं। उनका विशिष्ट क्षेत्र है-दलितों और साधन-हीनों के हृदयहीन शोषण का चित्रण और इसी संदेश को वे बार-बार सही जगह पहुँचाना चाहती हैं ताकि अनन्त काल से गरीबी-रेखा से नीचे साँस लेनेवाली विराट मानवता के बारे में लोगों को सचेत कर सकें। गैर-व्यावसायिक पत्रों में छपने के बावजूद उनके पाठकों की संख्या बहुत बड़ी है। उन्हें साहित्य अकादेमी, ज्ञानपीठ पुरस्कार व मैग्सेसे पुरस्कार समेत अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। |
















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