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Prithvi Parikrama (पृथ्वी परिक्रमा )

Original price was: ₹495.00.Current price is: ₹321.00.

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“सन् 1980 में सुप्रसिद्ध बौद्ध विद्वान कृष्णनाथ यूनिवर्सिटी ऑफ़ विस्कॉनसिन के निमंत्रण पर बौद्ध विद्वानों के एक सम्मेलन में हिस्सा लेने अमेरिका गये थे। यह यात्रा भी अनेकानेक अकादमिक उद्देश्य से की गयी विदेश यात्राओं की तरह विस्मृति को प्राप्त होती यदि इसे कृष्णनाथ जैसे मनीपी सं कमतर कोई व्यक्ति कर रहा होता।

अमेरिका जाते हुए कृष्णनाथ ने इस यात्रा में इटली, पारी (पेरिस), इंग्लैंड में केवल पड़ाव ही नहीं डाला, बल्कि इन जगहों में बौद्ध धर्म की अपनी जिज्ञासा से जुड़े स्थानों, संग्रहालयों, पुस्तकालयों का विस्तृत जायजा भी लिया। इन संग्रहों में कौन-सी विलुप्त प्रायः सामग्रियाँ अभी भी पुनः प्राप्त करके चापस अपनी जीवित बौद्धिक परम्परा में पुनर्वासित की जा सकती हैं, विशेषकर तिब्बती बौद्ध ग्रंथ, जो कम्युनिस्ट चीन के शासन में योजनाबद्ध तरीके से नष्ट किये जाते रहे हैं, इसका कुछ लेखा-जोखा इन नोटबुकों में दर्ज है।

एक समय में अधिकांश पृथ्वी को अभिभूत कर देने वाले बौद्ध धर्म का आज भिन्न देशों की परम्पराओं, वे पूर्वी हों या पश्चिमी, में क्या स्वरूप है, इसका एक खाका उनकी सां फ्रांसिस्को, लॉस एंजेलस की डायरियों को पढ़ते हुए मिलता है। जापान, हांगकांग, थाईलैंड के मठों, विहारों में उनके ध्यान-पड़ाव कृष्णनाथ को एक अद्भुत आभा देते हैं। कहीं वे भिक्षु जान पड़ते हैं, कहीं वीतरागी । यह पुस्तक एक बौद्ध मनीषी की पृथ्वी परिक्रमा का सुन्दर दस्तावेज तो है ही, गम्भीर जिज्ञासुओं को यात्राएँ कैसे करना चाहिए, इसका उज्ज्वल उदाहरण भी ।”

Author

Weight 0.5 kg
Dimensions 22.59 × 14.34 × 1.82 cm
Author

Krishnanath (कृष्णनाथ )

Language

Hindi

Publisher

Vani Prakashan

Pages

192

Year/Edtion

2009

Subject

Travels / Buddhism In Practice

Contents

N/A

About Athor

"कृष्णनाथ –

विचारक, लेखक, साधक और एकाकी यायावर कृष्णनाथ यायावर 1934 में काशी में एक स्वतन्त्रता सेनानी परिवार में पैदा हुए। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के पूर्व और पश्चात वे समाजवादी आन्दोलन से जुड़े और जन संघर्षों में भाग ले कर जेल यात्रा की। हैदराबाद में रह कर प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका 'कल्पना' तथा अंग्रेज़ी पत्रिका 'मैनकाइण्ड' का सम्पादन किया । जीविका के लिए काशी विद्यापीठ में अध्यापन कार्य, जहाँ कालान्तर में अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर बने । 'आर्थिकी' नामक अर्थशास्त्रीय पत्रिका के प्रथम सम्पादक बने । शनैः-शनै उनका चिन्तन अधिक सूक्ष्म एवं गहन विषयों में प्रवृत्त होने लगा। बौद्ध दर्शन ने उन्हें विशेष रूप से आकृष्ट किया। भारतीय और प्रवासी तिब्बती आचार्यों के साथ बैठ कर नागार्जुन के माध्यमिक दर्शन तथा तथा वज्रयान का अध्ययन क्रम चलने लगा। इसी के साथ चलता रहा उनका हिमालय यात्राओं का सिलसिला। अस्सी के दशक में विश्वप्रसिद्ध विचारक जे. कृष्णमूर्ति इन बौद्ध विद्वानों में से एक थे। कुछ वर्षों से वे हर साल कुछ महीने बेंगलूर के पास स्थित कृष्णमूर्ति स्टडी सेण्टर में एकान्त प्रवास करते हैं। जब वह दक्षिण भारत में नहीं रहते तब या तो हिमालय के किसी इलाके में भ्रमण करते हैं या काशी के निकट सारनाथ में रहते हैं ।

प्रकाशित ग्रन्थों में लदाख में राग-विराग, किन्नर धर्मलोक, स्पीति में बारिश, पृथ्वी परिक्रमा, बौद्ध निबन्धावली, हिमाल यात्रा, कुमाऊँ यात्रा, किन्नौर यात्रा प्रमुख हैं । सृजनशील लेखन के लिए उन्हें लोहिया विशिष्ट सम्मान भी प्राप्त हो चुका है।"

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