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Prem Ke Roopak Aadhunik Hindi Ki Prem Kavitaen (प्रेम के रूपक आधुनिक हिन्दी की प्रेम कविताएँ)

Original price was: ₹250.00.Current price is: ₹175.00.

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“प्रेम के रूपक –
कविता की जन्म-कथा जो वाल्मीकि ने कही है, जिसके अनुसार कविता का जन्म वाल्मीकि के मानस में उस क्रौंची के शोक रूपी बीज से होता है जिसके प्रेमी की, उनके रति-कर्म के दौरान, एक बहेलिये ने हत्या कर दी थी। क्रौंच की यह मृत्यु एक अर्थ में प्रेम (श्रृंगार) की भी मृत्यु है, जो शोक (करुण) के रूप में परिणित होकर कविता में फलित होती है। यूँ कविता का जन्म प्रेम की मृत्यु के गर्भ से होता है। इस अर्थ में कविता मात्र, अपने मूल रूप में, अपनी जन्मजात कारणता में, शोकमूलक (tragic) है। लेकिन शोक का यह भाव प्रेम के अ-भाव से, उसके विलोपन से अविनाभाव सम्बन्ध रखता है; वह प्रेम के अभाव का प्रतिलोम चिह्न है। इसलिए यह कहा जा सकता है कि कविता-मात्र अपने मूल रूप में, अपने डी.एन.ए. में, प्रेम के अभाव को एक प्रतिलोम चिह्न के रूप में धारण करती है। वह इस अभाव को अनहुआ नहीं कर सकती, क्योंकि इस अभाव का न होना स्वयं उसका (कविता का) न होना होगा। इसीलिए प्रेम (श्रृंगार) और कविता (करुण) के संयोग के अर्थ में प्रेम कविता एक असम्भव कल्पना है। वह, वस्तुतः इस अभाव को अनहुआ करने की कविता की प्रबल आकांक्षा के क्षणों में उसे अनहुआ न कर सकने की उसकी आस्तित्विक विवशता की छटपटाहट है, वह उस गर्भ में वापस लौटने की प्रबल अवचेतन आकांक्षा की विफलता से उत्पन्न छटपटाहट है जिस गर्भ से उसका जन्म हुआ है। लेकिन छटपटाहट के इन्हीं क्षणों में वह प्रेम की दुर्लभ छवियों की रचना करती है। अपनी मृत्यु से दुचार होने के इन क्षणों में वह अपनी देह-भाषा के सबसे क़रीब होती है। यह पुस्तक कविता में प्रेम के सौन्दर्यशास्त्र, उसकी गरिमामयी उपस्थिति और उसके अमूर्त रूप को अभिव्यक्त करती हैI

Author

Weight 0.5 kg
Dimensions 22.59 × 14.34 × 1.82 cm
Author

Madan Soni (मदन सोनी)

Language

Hindi

Publisher

Vani Prakashan

Pages

440

Year/Edtion

2010

Subject

Poetry

Contents

N/A

About Athor

"सम्पादक – मदन सोनी –
1952 में जन्मे मदन सोनी साहित्यिक आलोचना के क्षेत्र में अपनी एक सशक्त पहचान रखते हैंI लोर्का, ब्रेख़्त और एडवर्ड बॉन्ड की कविताओं का अनुवाद करने के अलावा उन्होंने एडवर्ड सैड के रिप्रेजेंटेशन ऑफ़ द इंटेलेक्चुअल का हिन्दी भाषा में अनुवाद किया है। उन्हें प्रतिष्ठित देवी शंकर अवस्थी पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। मूर्धन्य लेखक निर्मल वर्मा पर उनकी पुस्तक संस्कृति मन्त्रालय, भारत के साथी के रूप में लिखी गयी थी। वर्षों तक उन्होंने भारत भवन, भोपाल से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका ‘पूर्वाग्रह’ का सम्पादन किया। वे भारत भवन के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी भी रहे हैं।
"

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