| मेला –
भारतवर्ष मेलों का देश है। हर गाँव में, क़स्बे में, शहर में, हर साल कोई-न-कोई जुलूस, तमाशा होता है। इनमें से हर एक किसी-न-किसी घटना, त्यौहार या पर्व से जुड़ा होता है। मेले लगते भी ख़ास जगहों पर हैं। किसी मन्दिर के सामने, बाबा की कुटिया के पास, पीर के मज़ार के चारों ओर या फिर किसी तालाब या नदी के किनारे लेकिन गंगा के किनारे लगने वाले मेलों की बात ही और है। हज़ारों-लाखों गाँववासी बरबस खिंचे चले आते हैं इस नदी के तट पर। क्यों भला? क्या मिलता है गंगा तट पर? ऐसा क्या है गंगा में कि जिसकी वजह से ठण्ड से ठिठुरती औरतें, बच्चे, बूढ़े सभी डुबकी लगाकर नहाते हैं। शायद गंगा में पाप धोने की शक्ति है और पुण्य देने की भी। लेकिन इसे प्रदूषित करने वालों की तादाद बढ़ती जा रही है। आख़िर कहाँ तक पाप धोयेगी गंगा! इसी प्रश्न का उत्तर खोजने की कोशिश की गयी है इस उपन्यास में। |













