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Mahamilan (महामिलन)

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महामिलन –

विजयदान देथा की जानी-पहचानी और विशिष्ट कथा शैली में बूना गया उपन्यास है, ‘महामिलन’ गाँव इसकी कथा भूमि है, गौतम नाम का अनाथ हो गया बालक कथा – नायक है। अफ़ीमची पिता और डरी हुई माता की इस सन्तान का रिश्ता बहुत बचपन में हो जाता है। मगर यह रिश्ता किसी मुकाम तक पहुँचे, उसके पहले माता-पिता जीवन का ही रिश्ता तोड़कर दूसरे लोक चले जाते हैं। दुर्भाग्य इस बालक को बन्धक बनने पर मजबूर करता है।

मगर असल कथा वहाँ शुरू होती है, जहाँ गौतम-पिता द्वारा किये गये रिश्ते का सूत्र नये सिरे से थामने निकलता है। वह सूत्र उसकी पत्नी के रिश्तेदारों द्वारा तोड़ा जा चुका है। लेकिन गौतम कटिबद्ध है, प्राण देने का संकल्ला भी उसके साथ है। पत्नी उसे मिलती है, मगर वह उसे पहचानता नहीं। यह पहचान लेती है, ठिठोली करती है या परीक्षा लेती है, पता नहीं, मगर उसे पता है कि आने वाले दिनों में कई परीक्षाएँ बाकी हैं। यहाँ से विजयदान देथा की क़लम का कौशल अपने चरमोत्कर्ष पर होता है। जीवन में निहित विडम्बनाओं और मानव स्वभाव में मौजूद सम्भावनाओं का ऐसा अंकन करते हैं कि पाठक ठगा-सा रह जाता है। उसे भावनाओं के कई संघर्ष देखने को मिलते हैं, वह सरलता को दुनियादारी से लोहा लेता हुआ देखता है, सैद्धान्तिकता और नैतिकता को व्यावहारिकता और अनैतिकता से लड़ता हुआ पाता है। पूरे उपन्यास में एक आस्था झिलमिलाती रहती है, गौतम के जीतने का विश्वास, जो पाठक का भी विश्वास बन जाता है।

एक पुरातन लगती कथा की जब्जीर से आधुनिक समय को बाँधने का यह साहस विजयदान देथा ही दिखा सकते हैं। उपन्यास बहुत बड़ा नहीं है, लेकिन लेखकीय कौशल से बड़े फलक में पसर जाता है। ‘महामिलन’ में एक तरह की बहुफलकीयता भी है जिसके विभिन्न कोणों को समझने में पाठक को ज़रा भी मुश्किल नहीं होती है। -प्रियदर्शन

Author

Weight 0.5 kg
Dimensions 22.59 × 14.34 × 1.82 cm
Author

Vijaydan Detha (विजयदान देथा)

Language

Hindi

Publisher

Vani Prakashan

Pages

212

Year/Edtion

2008

Subject

Novel

Contents

N/A

About Athor

"
विजयदान देथा –

जन्म: दिसम्बर 1926, बोरुन्दा,(राजस्थान)।
माँ-सिरुकवर 1896-1946। पिता-सवलदानजी देशा, 1889-1930। पत्नी-सायर कुँवर – 1936, विवाह 1950 शिक्षा जसवन्त कॉलेज, जोधपुर, 1944-49। एम.ए. प्रथम वर्ष, हिन्दी राजस्थाना लोकगीत-छह भाग, संगीत नाटक अकादेमी, जोधपुर 1958, बाताँ री फलवाड़ी तेरह भाग दुविधा व अन्य कहानियाँ, राजकमल संस्करण-सारांश प्रकाशन, 1979 (दूसरा प्रकाशन, 1995)। उलझन (कहानी संग्रह) राजकमल प्रकाशन, 1882, (दूसरा संस्करण-सारांश प्रकाशन, 1996), फुलवाड़ा भाग- 10, हिन्दी अनुवाद, 1992, साहित्य अकादेमा नई दिल्ली, कब्बूरानी (बालकथाएँ), प्रकाशन विभाग, 1992, अलेखूँ हिटलर (राजस्थानी कहानी संग्रह), राजकमल प्रकाशन, 1984 रूख वाणीपुरम बोरुदा, 1987, चौधराइन की चतुराई, (हिन्दी अनुवाद) सायर प्रकाशन बोरुदा, 1996, सपनाप्रिया (कहानी संग्रह), भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, 1998, द डिललेमा एंड अंडर स्टोरीज़ (अंग्रेज़ी अनुवाद), मानुषी प्रकाशन, नई दिल्ली-1996, प्रतिशोध (उपन्यास), वाणी प्रकाशन, दिल्ली। फिल्म दुविधा, मणिकौल, परिणति, प्रकाश झा।
पुरस्कार- साहित्य अकादेमी 1974। भारतीय भाषा परिषद् कलकत्ता, 1990। नाहर पुरस्कार, बम्बई, 1995। जानकीदेवी पुरस्कार, मरुधारा, कलकत्ता, 1996।
"

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