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Iqbal Ki Zindagi Aur Shairi (इकबाल की जिंदगी और शायरी)

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“इक़बाल की ज़िन्दगी और शायरी –
हज़ारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पे रोती है
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा।
न सिर्फ़ उर्दू शाहरी, बल्कि बीसवीं सदी के समग्र भरतीय चिन्तन और साहित्य में इक़बाल का स्थान बहुत ऊँचा है। उर्दू अदब के पायेदार आलोचक डॉ. मोहम्मद अहसन फ़ारूको के शब्दों में “”गहराई और ऊँचाई में वह ग़ालिब के समकक्ष थे, चिन्तन और अध्यात्म में वह मौलाना सूफी के सदृश थे, परन्तु पश्चिम के आधुनिक चिन्तन में रच-बस जाने के कारण वह अपने उन दोनों उस्तादों से आगे दिखाई देते हैं।””

Author

Weight 0.5 kg
Dimensions 22.59 × 14.34 × 1.82 cm
Author

Suresh Salil (सुरेश सलिल)

Language

Hindi

Publisher

Vani Prakashan

Pages

86

Year/Edtion

2023

Subject

Ghazal

Contents

N/A

About Athor

"इक़बाल –
'तराना-ए-हिन्दी', 'हिमाला' और 'नया शिवाला' जैसी अमर नश्मे अदब को देने वाले इक़बाल का जन्म 9 नवम्बर, 1877 को सियालकोट (अब पाकिस्तान में) में हुआ था। उनके पूर्वज कश्मीरी ब्राह्मण (कौल) थे। फिलॉसफी से एम.ए. करने के बाद कुछ सालों तक वे लाहौर के ओरियंटल कालेज व इस्लामिया कालेज में अध्यापक रहे और उसी दरमियान अपनी पहली पुस्तक 'इल्मुलइक्तिसाद' (अर्थशास्त्र) प्रकाशित को विशेष अध्ययन के लिए 1905 में इक़बाल योरोप गये और केम्ब्रिज से स्नातकीय उपाधि हासिल करने के बाद 'दि डिवलपमेंट आफ़ मेटाफिज़िक्स इन एशियन नामक शोध प्रबन्ध लिख कर जर्मनी के म्युनिख विश्वविद्यालय से पीएच. डी. की डिग्री हासिल की। कुछ समय तक लन्दन विश्वविद्यालय में अरबी के प्रोफ़ेसर के रूप में उन्होंने अध्यापन भी किया। 1908 में स्वदेश वापसी के बाद कुछ समय तक क़ानूनी प्रैक्टिस करने के उपरान्त वे लाहौर के गवर्मेंट कालेज में फिलॉसफी के प्रोफ़ेसर नियुक्त हुए। इक़बाल ने हालाँकि दाग़ देहलवी को उस्ताद मानकर, 15 साल की उम्र में शेर कहना शुरू कर दिया था, मुशायरों में हिस्सा लेकर उस्तादों की प्रशंसा भी काफ़ी हासिल की थी और उनकी मशहर नज़्म 'हिमालय' का प्रकाशन भी 1901 में हो चुका था, लेकिन फारसी कविता की उनकी दो पहली किताबों- 'असरारे ख़ुदी' और 'रमूज़े बेख़ुदी' का प्रकाशन 1916 और 1918 के दरमियान हुआ। कुछ ही सालों के अरसे में असरारे ख़ुदी का अंग्रेज़ी अनुवाद, लन्दन से प्रकाशित होकर आया और उनके बारे में अंग्रेज़ी में एक आलोचनात्मक पुस्तक 'ए वॉयस आफ़ ईस्ट' प्रकाशित हुई।
1923 तक आते-आते इक़बाल को विद्वत्ता और रचनात्मकता को ख्याति दुनिया भर में इतनी फैल चुकी थी कि उससे प्रभावित होकर ब्रिटिश सरकार ने उन्हें 'सर' की उपाधि प्रदान की। उसके बाद इक़बाल का लगभग सारा जीवन अदबी और सियासी सरगर्मियों के बीच विदेश यात्राएँ करते हुए बीता। पंजाब विधायिका की सदस्यता आल इंडिया मुस्लिम लीग को इलाहाबाद कान्फ्रेंस में भाषण, दूसरी और तीसरी गोलमेज कान्फ्रेसों में शिरकत की वजह से अगर उनकी असरदार सियासी शख़्सियत ग़ौर की गयी, तो इटली की रॉयल एकेडेमी व महिद (स्पेन) यूनिवर्सिटी में व्याख्यान देकर, पेरिस में वर्गसौं जैसे महान दार्शनिक से मुलाकात करके उन्होंने अपनी दार्शनिक विद्वता की छाप भी दुनिया भर में छोड़ी। इन्हीं सब गहमा गहमियों के बीच पंजाब विश्वविद्यालय ने डी.लिट,की मानक उपाधि देकर उन्हें (1933 में) नवाजा। यह सम्मान पाने वाले वे पहले हिन्दुस्तानी थे। जीवन के अन्तिम वर्षों में अपने पैन इस्लामिक दर्शन और पाकिस्तान की अवधारणा के कारण डा. इक़बाल यद्यपि काफ़ी विवादास्पद भी रहे और वे विवाद अब तक बरकरार हैं, लेकिन हक़ीक़त यह भी है कि सांस्कृतिक समन्वय का महान सन्देश देती अपनी शाइरी के कारण डा. इक़बाल हिन्दुस्तान और पाकिस्तान, दोनों ही देशों में समान रूप से, सर्वोच्च फ़ौमी शख़्सियत की हैसियत रखते हैं। डॉ. इक़बाल को फारसी काव्यकृतियों (असरारेख़ुदी, रमजे-बेख़ुदी, मस्नवी पस वे बायद कर्द व मुसाफिर, पयामे-मशरिक ज़बूरे-अज़म और जावेदनामा) के अलावा उनको चार उर्दू काव्यकृतियाँ चागे दग वाले जिब्रोल, जब कलीम और अर्मुगाने हिजाज़ हैं। प्रस्तुत चयन में उपर्युक्त चारों काव्यकृतियों से रचनाओं का चुनाव इस प्रकार किया गया है कि उर्दू न जानने वाले हिन्दी काव्य प्रेमियों को इक़बाल के प्रतिनिधि चयन का भरपूर अस्वाद मिल सके। इक़बाल मनुष्य को शक्ति पर पूरा भरोसा रखते थे और उसके भविष्य के ऐसे गीत गाते थे कि उन्हें जो भी पढ़ेगा उन विचारों के संगीत और प्रवाह में बहने लगेगा।
डा. इक़बाल का निधन 21 अप्रैल, 1938 को हुआ।

"

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