| हिन्दी विविध व्यवहारों की भाषा – यह पुस्तक सामान्य पाठ्य पुस्तकों वाली प्रचलित सरलीकृत और पिष्टपेषित पद्धति से किंचित् हटकर लिखी गयी है, जिससे प्रयोजनमूलक हिन्दी और अनुवाद विषय के छात्रों के लिए ही नहीं, सामान्य पाठकों के उपयोग की भी हो सकती है। छात्रों को मौलिकता-प्रदर्शन का अवकाश दिया जाये तथा उनमें आलोचनात्मक दृष्टि का विकास हो, यह विगत ढाई दशकों से एक अध्यापक के रूप में मेरा काम्य रहा है। विडम्बना यह है कि आजीविकोन्मुख तथा तोतारटंतवाली शिक्षा-पद्धति में यह कामना शुभेच्छा मात्र बनकर रह जाती है। फिर भी मैं नकारात्मक सोच और हताशा की कोई ज़रूरत नहीं समझता। हम भले ही नव-स्वतन्त्र राष्ट्र के रूप में मैकाले के सुदृढ़ गढ़ को तोड़ने में अक्षम सिद्ध हुए हों, पर बन्द दिमाग़वाली अपनी क़ैदी नियति के बारे में तो सोच ही सकते हैं। इस तरह से सोचने का भी अपना रचनात्मक महत्त्व है। अगर यह पुस्तक पाठकों को भारत की भाषा-समस्या, भारतीय भाषाओं की स्थिति, हिन्दी के वर्तमान और भविष्य आदि के सम्बन्ध में स्वतन्त्र किन्तु दायित्वपूर्ण ढंग से सोचने की दिशा में अग्रसर कर सके, तो यह इसकी बड़ी सफलता होगी। |
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Hindi Vividh Vyvaharon Ki Bhasha (हिन्दी विविध व्यवहारों की भाषा )
Original price was: ₹200.00.₹130.00Current price is: ₹130.00.
| author | Dr. Suvas Kumar (डॉ. सुवास कुमार ) |
|---|---|
| publisher | Vani Prakashan |
| language | Hindi |
| pages | 180 |















