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Mein Jo Hoon, ‘Jon Elia’ Hoon (मैं जो हूँ ‘जॉन एलिया’ हूँ )
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Price range: ₹209.00 through ₹260.00
“मैं जो हूँ जॉन एलिया हूँ जनाब
इसका बेहद लिहाज़ कीजिएगा।
ये जो जॉन एलिया के कहने की ख़ुद्दारी है कि मैं एक अलग फ्रेम का कवि हूँ, यह परम्परागत शायरी में बहुत कम ही देखने को मिलती है। जैसे—
साल हा साल और इक लम्हा,
कोई भी तो न इनमें बल आया
ख़ुद ही इक दर पे मैंने दस्तक दी,
ख़ुद ही लड़का सा मैं निकल आया
जॉन से पहले कहन का ये तरीक़ा नहीं देखा गया था। जॉन एक ख़ूबसूरत जंगल हैं, जिसमें झरबेरियाँ हैं, काँटे हैं, उगती हुई बेतरतीब झाड़ियाँ हैं, खिलते हुए बनफूल हैं, बड़े-बड़े देवदारु हैं, शीशम हैं, चारों तरफ़ कूदते हुए हिरन हैं, कहीं शेर भी हैं, मगरमच्छ भी हैं। उनकी तुलना में आप यह कह सकते हैं कि बाक़ी सब शायर एक उपवन हैं, जिनमें सलीक़े से बनी हुई और क़रीने से सजी हुई क्यारियाँ हैं, इसलिए जॉन की शायरी में प्रवेश करना ख़तरनाक भी है। लेकिन अगर आप थोड़े-से एडवेंचरस हैं और आप फ्लेम से बाहर आकर सब कुछ करना चाहते हैं तो जॉन की दुनिया आपके लिए है।
जॉन आपको दो तरह से मिलते हैं। एक दर्शन में और एक प्रदर्शन में। प्रदर्शन का जॉन वह है जो आप आमतौर पर किसी भी मंच से पढ़ें तो श्रोताओं में ख़ूब कोलाहल मचता है। दर्शन का जॉन वो है जो आप चुनिन्दा मंचों पर पढ़ सकते हैं और वे शे’र ऐसे होते हैं जिन्हें श्रोता अपने साथ अपने घर ले जा सकते हैं। जहाँ मजमा हो, वहाँ प्रदर्शन सुनाइए और जहाँ महफ़िल हो, वहाँ दर्शन सुनाइए। जैसे दर्शन का शे’र देखें-
निकल आया मैं अपने अन्दर से
अब कोई डर नहीं है बाहर से
अब जो डर है मुझे, तो इसका है
अन्दर आ जाएँगे मेरे अन्दर से
जॉन जहाँ पहुँच गये हैं, उसकी ख़बर उन्हें खुद भी नहीं है। वे स्वयं को कई बार फँसा हुआ महसूस करते हैं। उन्हें लगता है कि वे गलत वक़्त में पैदा हुए हैं। उन्हें इस बात का एहसास है कि वो जितनी आज़ादी से अपनी बात कहना चाह रहे हैं, वैसे कह नहीं पा रहे और यदि कह भी पा रहे हैं तो लोग उस तरह से समझ नहीं पा रहे।
कुल मिलाकर ज़िन्दगी के हर उतार-चढ़ाव को न सिर्फ़ शायरी में ढालना, बल्कि उसको एंजॉय करना और श्रोताओं-पाठकों से एंजॉय करवाना-ये जॉन होते हैं।
तो जॉन को पढ़ें, जॉन को जियें और एक बिल्कुल नयी दुनिया में विचरण कर के आयें। यक़ीनन जब आप बाहर आयेंगे तो जॉन आपकी सोच का स्थायी हिस्सा हो चुके होंगे।
”
| Weight | 0.5 kg |
|---|---|
| Dimensions | 22.59 × 14.34 × 1.82 cm |
| Language | Hindi |
| Publisher | Vani Prakashan |
| Pages | 156 |
| Year/Edtion | 2021 |
| Subject | Ghazal |
| Contents | N/A |
| About Author | जॉन एलिया पाकिस्तान के मशहूर कवि, शायर और दार्शनिक। जन्म : 14 दिसम्बर 1931, अमरोहा, उत्तर प्रदेश। पाकिस्तान के स्वतन्त्र राष्ट्र बन जाने के बाद जॉन एलिया 1957 में स्थायी रूप से कराची में बस गये। रजब के तेरहवें दिन (जो कि इमाम अली का भी जन्मदिन है) जन्म लेने के कारण वे ख़ुद को पैगम्बर मुहम्मद की वंश-परम्परा से सम्बद्ध सैयदों का वंशज कहा कहते थे। उन्होंने इस्लामी न्यायशास्त्र के 'देवबन्द स्कूल' में अध्ययन किया था। इस एक तथ्य के अलावा उन्होंने कभी भी अपने आप को धर्म या सम्प्रदाय से नहीं जोड़ा। हालाँकि शरुआती नापसन्दगी के बावजूद भी वे मार्क्सवाद के राजनीतिक दर्शन से गहरे जुड़े थे लेकिन उन्होंने बराबर अपने आपको एक प्रवासी और अराजक ही समझा। जॉन एलिया को उर्दू के साथ-साथ अरबी, अंग्रेज़ी, फारसी, संस्कृत और हिब्र भाषा की अच्छी जानकारी थी। उनके बारे में शायर पीरजादा कासिम का कहना है, “भाषा को लेकर जॉन बहुत ख़ास रुख़ अख़्तियार करते थे। उनकी भाषा की जड़ें क्लासिकल परम्परा में हैं लेकिन वे अपनी कविता और शायरी के लिए हमेशा नये विषयों को अपनाने से भी नहीं चूके। जॉन ताउम्र एक आदर्श की खोज में लगे रहे लेकिन दुर्भाग्यवश उसे पा न सके जिसके कारण उनके भीतर एक अजीब असन्तोष और खिन्नता घर कर गयी। उन्हें लगता रहा कि उन्होंने अपना हुनर और प्रतिभा यूँ ही जाया कर दिया है।" जॉन एलिया की कविता और शायरी की प्रमुख कृतियों में शुमार हैं-'शायद' (1991), 'यानी' (2003), 'गुमान' (2006) और 'गोया' (2008)। उन्होंने अरबी और फ़ारसी भाषा से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण अनुवाद भी किये हैं। यह उनके अनुवाद की मौलिकता ही कही जाएगी कि अरबी-फ़ारसी की मूल कृतियों का अनुवाद करते हुए उन्होंने उर्दू भाषा के कई नये शब्दों का आविष्कार किया है। उनकी प्रमुख अनूदित कृतियाँ हैं : 'मसीह-ए-बगदाद हल्लाज', 'ज्योमेट्रिया', 'तवासिन', 'इसागोजी', 'रहीश-ओ-कुशैश' और 'रसल अख्वान-उस-सफ़ा' । 'फरनूद' (2012) जॉन एलिया के विचारप्रधान लेखों का संकलन है जिसमें 1958 और 2002 के बीच लिखे गये निबन्ध और लेख शामिल हैं। इन लेखों में जॉन ने राजनीति, संस्कृति, इतिहास, भाषाशास्त्र जैसे विविध विषयों पर अपने विचार व्यक्त किये हैं। 'फरनूद' में अदबी जर्नल 'इंशा' (जिसका सम्पादन वे ख़ुद करते थे), 'आलमी डाइजेस्ट' और ज़िन्दगी के आख़िरी दौर में 'सस्पेंस डाइजेस्ट' के लिए लिखे गये निबन्धों का संकलन किया गया निधन : 8 नवम्बर 2002 " |
| author | Dr. Kumar Vishwas (डॉ. कुमार विश्वास ) |















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