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Arghan (अरघान)

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“अरघान –
सृजनात्मकता किसी नियम का पालन नहीं करती बल्कि यह कहना ज़्यादा सही होगा कि यह अपने नियम स्वयं बनाती हैI सर्जना का पथ और अनुभूति दोनों अभूतपूर्व हैंI कोई भी रचना अपना समय, काल, उद्देश्य और कला का रूप चुनती है और यही उसकी अपनी विशिष्ट पहचान भी बन जाती हैI त्रिलोचन सहज ही अपनी पहचान बनाते हैंI आज हिन्दी में शायद ही कोई साधक हो जो हिन्दी की परम्परा से इतना सुपरिचित हो जितना त्रिलोचनI परम्परा में इतना रमने के बावजूद रचना में अभूतपूर्वता लाना यानी परम्परा का यथोचित त्याग निर्मम साधना है। त्रिलोचन मार्मिकता प्रायः वहाँ देखते, दिखाते हैं जहाँ सामान्यतः लोग ठहर कर देखते भी नहीं। जब वे कविता में किसी जानी पहचानी स्थिति का भी चित्रण करते हैं तो उसे नये बोध से भर देते हैं। त्रिलोचन की कविताएँ समझने के लिए केवल उनकी लिखी पंक्तियाँ ही नहीं पढ़ी जा सकती बल्कि उन पंक्तियों के सौन्दर्य को आत्मसात किया जाता है तभी उनका अर्थ पाठकों को प्राप्त होगाI उनकी पंक्तियों में जो तरावट है वह एक क़िस्म का कसाव उत्पन्न करती है जिसमें संयम का आकाश तो है ही साथ ही भाषा और छन्द में कसी स्थितियाँ ही रूपायित होती हैं। इसीलिए यहाँ ‘रूप’ है ‘रूपवाद’ नहीं। त्रिलोचन की शिल्प-साधना, स्थिति योजन की ही साधना है।

Author

Weight 0.5 kg
Dimensions 22.59 × 14.34 × 1.82 cm
Author

Trilochan (त्रिलोचन)

Language

Hindi

Publisher

Vani Prakashan

Pages

132

Year/Edtion

2012

Subject

Criticism

Contents

N/A

About Athor

"त्रिलोचन –
कवि त्रिलोचन को हिन्दी साहित्य की प्रगतिशील काव्यधारा का प्रमुख हस्ताक्षर माना जाता है। वे आधुनिक हिन्दी कविता की प्रगतिशील त्रयी के तीन स्तम्भों में से एक थे। इस त्रयी के अन्य दो स्तम्भ नागार्जुन व शमशेर बहादुर सिंह थे। उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर ज़िले के कठघरा निरानी पट्टी में जगरदे सिंह के घर 20 अगस्त, 1917 को जन्मे शास्त्री का मूल नाम वासुदेव सिंह था। उन्होंने काशी हि. विद्यालय से एम.ए. अंग्रेज़ी की एवं लाहौर से संस्कृत में शास्त्री की डिग्री प्राप्त की थी। उत्तर प्रदेश के छोटे से गाँव से बनारस विश्वविद्यालय तक अपने सफ़र में उन्होंने दर्जनों पुस्तकें लिखीं और हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया। शास्त्री बाजारवाद के धुर विरोधी थे। हालाँकि उन्होंने हिन्दी में प्रयोगधर्मिता का समर्थन किया। उनका कहना था, भाषा में जितने प्रयोग होंगे वह उतनी ही समृद्ध होगी। शास्त्री ने हमेशा ही नवसृजन को बढ़ावा दिया। वह नये लेखकों के लिए उत्प्रेरक थे। जीवन के अन्तिम वर्ष उन्होंने अपने सुपुत्र अमित प्रकाश सिंह के परिवार के साथ हरिद्वार के पास ज्वालापुर में बिताये। अन्तिम वर्षों में भी काफ़ी जीवन्त रहे। वार्धक्य ने शरीर पर भले ही असर डाला था पर उनकी स्मृति या रचनात्मकता मन्द नहीं पड़ी थी। त्रिलोचन शास्त्री हिन्दी के अतिरिक्त अरबी और फारसी भाषाओं के निष्णात ज्ञाता माने जाते थे। पत्रकारिता के क्षेत्र में भी वे ख़ासे सक्रिय रहे। उन्होंने 'प्रभाकर', 'वानर', 'हंस', 'आज', 'समाज' जैसी पत्र-पत्रिकाओं का सम्पादन किया। त्रिलोचन शास्त्री 1995 से 2001 तक जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी रहे। इसके अलावा वाराणसी के ज्ञानमंडल प्रकाशन संस्था में भी काम करते रहे और हिन्दी व उर्दू के कई शब्दकोशों की योजना से भी जुड़े रहे। इसके अतिरिक्त कहानी, गीत, ग़ज़ल और आलोचना से भी उन्होंने हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया। उनका पहला कविता संग्रह 'धरती' 1945 में प्रकाशित हुआ था। 'गुलाब और बुलबुल', 'उस जनपद का कवि हूँ' और 'ताप के ताये हुए दिन' उनके चर्चित कविता संग्रह थे। 'दिगंत' और 'धरती' जैसी रचनाओं को क़लमबद्ध करने वाले त्रिलोचन शास्त्री के 17 कविता संग्रह प्रकाशित हुए।
पुरस्कार व सम्मान : त्रिलोचन शास्त्री को 1989-90 में हिन्दी अकादमी ने शलाका सम्मान से सम्मानित किया था। हिन्दी साहित्य में उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्हें 'शास्त्री' और 'साहित्य रत्न' जैसी उपाधियों से सम्मानित किया जा चुका है। 1982 में 'ताप के ताये हुए दिन' के लिए उन्हें साहित्य अकादेमी का पुरस्कार भी मिला था।
9 दिसम्बर, 2007 को ग़ाज़ियाबाद में निधन।
चयन एवं सम्पादन – विष्णुचंद्र शर्मा –
समादृत कवि-लेखक और अनुवादक। ‘कवि’ पत्रिका के सम्पादक।
"

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