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Vidyapati Padavali (विद्यापति पदावली )

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Vidyapati Padavali (विद्यापति पदावली )

Author

Weight 0.5 kg
Dimensions 22.59 × 14.34 × 1.82 cm
Author

Vidyapati, Edited by Mahendranath Dubey (विद्यापति, सम्पादक : महेन्द्रनाथ दुबे )

Language

Hindi

Publisher

Vani Prakashan

Pages

878

Year/Edtion

2024

Subject

Geet

Contents

N/A

About Author

"महाकवि विद्यापति को कवि कोकिल कहा जाता है। विश्व भर में उनके काव्य की ख्याति है। महाकवि का जन्म 1875 ई. में दरभंगा जिला (बिहार) के विस्फी नामक गाँव में हुआ था। उनके पिता पण्डित गणपति ठाकुर मिथिला नरेश महाराजा गणेश्वर सिंह के राज-सभासद विद्यापति के पिता संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान थे।
विद्यापति में बचपन से ही काव्य-रचना की अलौकिक प्रतिभा थी। उन्होंने अल्पायु में ही महाराजा गणेश्वर सिंह के पुत्र राजकुमार कीर्ति सिंह की प्रशंसा में 'कीर्तिलता' नामक ग्रन्थ की रचना की थी। विद्यापति मिथिला राजवंश के चार महाराजाओं क्रमशः गणेश्वर सिंह, भाव सिंह, देव सिंह और शिव सिंह के राजदरबार में राजकवि के पद पर सुशोभित रहे। उन्हें काफी सम्मान मिला। उनकी अलौकिक काव्य क्षमता से प्रभावित होकर विस्फी गाँव पुरस्कार स्वरूप दिया गया था।
विद्यापति का काव्य संसार विशाल था। वे गंगा नदी के बहुत बड़े भक्त थे। हालाँकि उनका घर गंगा नदी से काफी दूर था, लेकिन गंगा स्नान के लिए उनका मन लालायित रहता था। उनकी भक्ति के सम्बन्ध में कहा जाता है कि वे जब गंगा नदी में स्नान करते थे तब गंगा से इस बात के लिए क्षमा माँगते थे कि उनके पैरों से गंगा जल का स्पर्श हो गया। वे गंगा से प्रार्थना करते थे कि उनकी मृत्यु जब भी हो तो गंगा किनारे हो। गंगा की शरण में हो। कहा जाता है कि उनकी मृत्यु के समय गंगा नदी दिशा बदलकर उनके पास पहुँच गयी थी।
विद्यापति भक्ति और शृंगार रस के कवि थे। उनकी अमर रचनाओं में मैथिली भाषा की पदावली और 'गोरक्षा विजय' नाटक का विशेष महत्त्व है। इस ग्रन्थ पर उन्हें मैथिली कोकिल की उपाधि मिली थी। न केवल मैथिली में बल्कि संस्कृत में भी उनकी अनेक रचनाएँ हैं। इनमें 'पुराण संग्रह’, ‘भू-परिक्रमा’, ‘गंगा काव्यावली', 'दान-वाक्यावली', 'विभासागर' आदि प्रमुख हैं।
कवि कोकिल मैथिल शिरोमणि विद्यापति अपनी रचनाओं एवं अलौकिक काव्यशक्ति के लिए जन-जन के दिलों पर छाये हुए हैं। उनकी याद युगों-युगों तक रहेगी। गेय शैली में रचित उनके गीत-पदावलियों में भक्ति और शृंगार का अद्भुत समन्वय है। लोकभाषा, लोकशैली और गेय होने के कारण उनकी रचना लाखों-लाख कण्ठों में बसी है। उनकी रचनाएँ हमारे लिए विरासत और धरोहर हैं।
पाठ सन्देश : विद्यापति के व्यक्तित्व से हमें अपनी सभ्यता-संस्कृति के प्रति आस्था और विश्वास की प्रेरणा मिलती है।
"

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