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Ve Andhere Din (वे अंधेरे दिन)

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“वे अंधेरे दिन –
‘वे अंधेरे दिन’ पुस्तक तसलीमा नसरीन के जीवन के उन अंधेरे दिनों की गाथा बयान करते हैं जब उन्हें लगभग दो महीने, गहन और नितान्त अकेले, सन्नाटे भरे अँधियारे में आत्मगोपन करके रहना पड़ा था। वह भी अपने देश में। यह उपन्यास मूलतः तथ्यपरक घटनाओं पर आधारित है। बांग्लादेश में प्रकाशित ‘आजकेर काग़ज़’, ‘भोरेर काग़ज़’, ‘इत्तफाक’, ‘संवाद’,‘बांग्ला बाज़ार’, ‘इन्क़लाब’, ‘दिनकाल’, ‘संग्राम’ आदि दैनिक अख़बारों से उन दिनों की ख़बरों से ली गयी हैं।

Author

Weight 0.5 kg
Dimensions 22.59 × 14.34 × 1.82 cm
Author

Taslima Nasrin Translated By Sushil Gupta (तसलीमा नसरीन, अनुवाद – सुशील गुप्ता)

Language

Hindi

Publisher

Vani Prakashan

Pages

470

Year/Edtion

2011

Subject

Autobiography

Contents

N/A

About Athor

"तसलीमा नसरीन –
जन्म 25 अगस्त, 1962 को बांग्लादेश के मैमनसिंह क़स्बे में। मैमनसिंह मेडिकल कॉलेज से एम.बी.बी.एस. करने के बाद सरकारी अस्पतालों में नौकरी। 'नौकरी करनी है तो लिखना छोड़ना होगा'- इस सरकारी निर्देश पर नौकरी से इस्तीफा। धर्म और पितृसत्ता, औरत की आज़ादी में सबसे बड़ी बाधा है-बेबाक लफ़्जों में इस सच्चाई को उजागर करते हुए, धर्म, औरत की अवमानना कैसे करता है, इसका साफ़-साफ़ बयान। इसके लिए सिर्फ पुरातनपन्थी धार्मिक लोगों के हमलों का ही शिकार नहीं हुईं, बल्कि देश-व्यवस्था और पुरुष प्रधान समाज ने भी उनके ख़िलाफ़ जंग का ऐलान कर दिया। कट्टर धार्मिक मौलवी-मुल्लाओं ने भी उनकी फाँसी की माँग करते हुए। देश-भर में आन्दोलन छेड़ दिया। उसके बाद से निर्वासन की ज़िन्दगी बिता रही हैं। उन्होंने भारत में स्थायी नागरिकता के लिए आवेदन किया है। आत्मकथा, उपन्यास, कहानी संग्रह, कविता संग्रह, निबन्ध और स्त्री विमर्श पर उनकी दर्जनों पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।

अनुवादक – सुशील गुप्ता –
साहस साथ, किसी अदम्य साहस का हाथ थाम लेना, इन्सान का मनोबल बढ़ा देता है। ज़िन्दगी जब मुश्किल में हो, तो जूझने की एक अन्धी ताक़त जन्म लेती है। जो अन्त तक जूझता है, वह जीत जाता है, जो लड़खड़ा जाता है, वह हार जाता है। इसके बाद भी, जो महामना होता है, दुनिया-ज़माने से मिली, सारी कड़वाहट भूलकर, सबको माफ़ कर देता है और उन सबमें अपना निश्छल प्यार बाँटता है, जिन्हें प्यार की बेहद ज़रूरत है। अब, सच या बेलाग बोलना, लोगों की निगाहों में जुर्म हो, तो हो। इसके लिए लो जान के दुश्मन हो जाते हैं, तो हों-यह सब मैंने तसलीमा से सीखा है, जिसने मुझे 'दोस्त' कहकर अचानक मुझे अमीर बना दिया है। 'वे अंधेरे दिन' उसके उन भीषण दहशतभरे दिनों की कहानी है, जिस अग्निपरीक्षा में तपकर, वह कुंदन बनकर निकली है। दुनिया की खुदगर्जी, मक्कारी और निर्ममता के भीषण कड़वाहट से भरी मैं उनकी आत्मकथा का अनुवाद करते-करते मैंने जाना है भयंकर साम्प्रदायिकता, जातिवाद, अपनों के बारे में मोहभंग के खिलाफ, इन्सान को हमेशा नाजुक-सुकुमार फूल बनकर महकना चाहिये। अनुवाद के इस सफर में मुझे एक 'दोस्त', तसलीमा नसीब हुई है और यही मेरे जीने-जूझने के लिए काफ़ी है।
अब तक लगभग 65 बंगला उपन्यासों का अनुवाद! 3 निजी काव्य-संग्रह! कई-कई पुरस्कार और पाठकों का अमित प्यार, यही मेरी पूँजी है।
"

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