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Sinhapura : Dweep Desh ka Pravasi Gadya (सिंहापुर : द्वीप देश का प्रवासी गद्य )

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“सिंगापुर में हिन्दी भाषा, हिन्दी शिक्षण, और प्रवासी साहित्य से सम्बन्धित गतिविधियाँ कई अन्य देशों के मुक़ाबले मात्रा और गुणवत्ता दोनों दृष्टियों से उच्चतर स्तर पर हैं, लेकिन विभिन्न कारणों से हिन्दी-कर्मियों का ध्यान इस पर नहीं गया। यहाँ प्रवासी साहित्य न केवल विपुल मात्रा में लिखा जा रहा है, बल्कि यह विविध विधाओं में भी लिखा जा रहा है और इसमें हमें अनछुए विषय भी दिखाई देते हैं। यहाँ हिन्दी में जीवन को दिशा देने का साहित्य भी दिखाई देता है, ऑनलाइन और ऑफ़लाइन चर्चा और कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं, और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में किशोर-युवा-वयस्क सभी लोग सक्रियता से भाग लेते हैं। इसी सबकी बानगी लिए है, सिंगापुर का यह प्रथम गद्य संग्रह ‘सिंहापुरा’, जिसमें संस्मरण और यात्रा-वृत्तान्त शामिल किये गये हैं। ये रचनाएँ हमें जीवन के अनुभूत विषयों में ले जाती हैं और आत्मीयता, प्रेरणा, संघर्ष और जिजीविषा का परिचय देती हैं। विशेष बात यह है कि इन लेखकों में से अनेक का कार्यजगत हिन्दी भाषा से जुड़ा हुआ नहीं है, और इसलिए यह न केवल हिन्दी के प्रति उनके जुनून को दर्शाता है, बल्कि इसी कारण हमारे समक्ष विषयों, प्रसंगों और अनुभवों का विस्तृत और अब तक अपरिचित फलक भी उद्घाटित करता है। डॉ. संध्या सिंह सिंगापुर में हिन्दी और भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार में दशकों से कटिबद्ध हैं और यह हर्ष का विषय है कि उनके सद्प्रयास सार्थक रूप में फलीभूत हो रहे हैं।
– प्रो. राजेश कुमार
वरिष्ठ साहित्यकार और भाषा-कर्मी

★★★

आद्या अचानक बहुत चिन्ताग्रस्त दिखाई देने लगी, हर समय अपने हाथ धोती रहती और आस-पास की वस्तुओं को छूने से कतराती। मुझे और मयंक को लगा शायद परीक्षा पास आ रही है इसलिए चिन्तित है लेकिन जब तक हमें समझ आता, आद्या को ओ.सी.डी. (Obsessive Compulsive Disorder) पूरी तरह अपनी गिरफ्त में कर चुका था।
– दूसरी उड़ान से

★★★

सिंगापुर के आवासीय परिसर के तरणताल के पास की कुर्सी पर काले रंग की जींस और सफ़ेद टीशर्ट पहने इतराकर बैठी नीमा। एक पहेली थी नीमा जो अपने पीछे कई सवाल छोड़ गयी। कहाँ से आयी थी ये तो पता था पर कहाँ गयी इसके बारे में मात्र अनुमान ही लगा सकती हूँ। दावे के साथ नहीं कह सकती।
– कहाँ गयी नीमा? से

★★★

वापस एयरपोर्ट पर खड़ा हूँ और सोच रहा हूँ बिटिया के लिए कुछ ले लूँ। एक लकड़ी का छोटा-सा खिलौना लेता हूँ, पत्नी के लिए कान की बालियाँ और निज के लिए एक मैग्नेट। अपने लिए तो इतना कुछ लिया है मैंने- मुस्कुराते चेहरे, ज़्यादा दिये गये पैसो, वो लाल ड्रेस वाली टैक्सी ड्राइवर और वो बिन्दी वाली रेस्तराँ की वेटर। मकाती की कीचड़ वाली और रौशन सड़कें और बी.जी. सी. की आधुनिकता।
मनीला : एक मुस्कुराता शहर से

★★★

उन धुंधली पड़ती यादों की परछाइयाँ आज भी मेरे मन-मस्तिष्क से नहीं गयीं। लोग कहते हैं कि ये सब दिमाग़ की खुराफ़ातें हैं और कुछ नहीं। कुछ का कहना है कि यह सब ‘पावर ऑफ़ सजैशन’ का कमाल है। भला इतनी छोटी उम्र में कब, कैसे और किसने मेरे दिमाग़ में ऐसे रंग-बिरंगे दृश्य भर दिये होंगे?
– मायाजाल से

★★★

मेरे घर की दहलीज़ एक ऐसा स्थान है जहाँ मैं अपने फुर्सत के पल गुज़ारा करती हूँ। राहगीरों की भीड़ कभी मेरा आकर्षण खींचती है तो कभी सुनसान सड़क की ख़ामोशी के पीछे छिपी कहानियाँ मुझे अतीत में खड़ा कर देती हैं, कारण अतीत की स्मृतियाँ हमारे वर्तमान क्षणों को सुख जो पहुँचाती हैं। उस दहलीज़ की एक और कथा कि मैं अपने जीवन की सभी योजनाएँ यहीं सँभालती हूँ।
-चक्षुदर्शन से अभिप्रेरणा से

Author

Weight 0.5 kg
Dimensions 22.59 × 14.34 × 1.82 cm
Author

Edited by Divya Mathur, Sandhya Singh (सम्पादक : दिव्या माथुर, संध्या सिंह )

Language

Hindi

Publisher

Vani Prakashan

Pages

152

Year/Edtion

2025

Subject

Memoirs/Travelogue

Contents

N/A

About Athor

"दिव्या माथुर :
वातायन-यूके की संस्थापक, रॉयल सोसाइटी ऑफ़ आर्ट्स की फ़ेलो, आशा फ़ाउंडेशन की संस्थापक-सदस्य, ब्रिटिश-लाइब्रेरी और टेट मॉडर्न की 'फ्रेंड', 'पद्मभूषण मोटुरी सत्यनारायण लेखन सम्मान', 'वनमाली कथा सम्मान', आर्ट्स-काउंसिल ऑफ़ इंग्लैंड के ' आर्ट्स-अचीवर सम्मान' और हाल ही में नैशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ सिंगापुर एवं विश्व हिन्दी सचिवालय में मॉरीशस के प्रधान मन्त्री द्वारा सम्मानित, दिव्या माथुर नेहरू केन्द्र-लन्दन में वरिष्ठ अधिकारी, विश्व हिन्दी सम्मेलन-2000 की सांस्कृतिक उपाध्यक्ष, यूके हिन्दी समिति की उपाध्यक्ष और कथा-यूके की अध्यक्ष रह चुकी हैं। आपका नाम 'इक्कीसवीं सदी की प्रेरणात्मक महिलाएँ', आर्ट्स कॉउंसिल ऑफ़ इंग्लैंड की 'वेटिंग रूम', 'एशियंस हूज़ हू', 'सीक्रेट्स ऑफ़ वर्ड्स इंस्पिरेशनल वीमेन' जैसे कई ग्रन्थों में साम्मलित है। आप बहु-पुरस्कृत लेखिका, बाल पुस्तकों की अनुवादक और सम्पादक हैं; जिनके सात कहानी-संग्रह, आठ कविता-संग्रह, दो उपन्यास, ‘तिलिस्म' और 'शाम भर बातें' (कई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल), बाल उपन्यास 'बिन्नी बुआ का बिल्ला' और छह सम्पादित कहानी और काव्य-संग्रह प्रकाशित हैं। साहित्य अकाडमी-शिमला, जयपुर लिटरेचर फ़ेस्टिवल, कासा डा ला विश्वविद्यालय (स्पेन) विश्वरंग-भोपाल, कोलंबिया-न्यू- यॉर्क, हिन्दी विश्वविद्यालय-वर्धा जैसे कई प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों द्वारा आमन्त्रित और सम्मानित की जा चुकी हैं। उनकी रचनाओं पर प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में लगभग पच्चीस शोध हो चुके हैं और हो रहे हैं। दूरदर्शन द्वारा आपकी कहानी, साँप सीढ़ी पर एक टेली-फ़िल्म बनायी है। डॉ. निखिल कौशिक द्वारा निर्मित 'घर से घर तक का सफ़र : दिव्या माथुर' को विभिन्न फ़िल्म फ़ेस्टिवल्स में शामिल किया जा चुका है।

★★★

डॉ. संध्या सिंह
वाराणसी, भारत में जन्मीं डॉ. संध्या सिंह ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। वर्तमान में, वे नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ सिंगापुर में हिन्दी और तमिल भाषा विभाग की प्रमुख हैं। वे सिंगापुर की हिन्दी संस्था संगम सिंगापुर की अध्यक्ष और हिन्दी पत्रिका सिंगापुर संगम की सम्पादक भी हैं। वे हिन्दी सोसाइटी सिंगापुर की प्रबन्धन समिति में हैं। उन्होंने सिंगापुर के विश्वविद्यालयों व शैक्षणिक संस्थानों के लिए हिन्दी पाठ्यक्रम निर्माण और विभिन्न संस्थाओं से जुड़ी गतिविधियों के आयोजन में सक्रिय भूमिका निभाई है। वे सिंगापुर के विभिन्न मंत्रालयों के लिए हिन्दी से सम्बन्धित कार्यों में सक्रिय हैं। वे भरता और सिंगापुर की कई महत्त्वपूर्ण संस्थाओं के परामर्श मण्डल का हिस्सा हैं। विभिन्न लेखों के साथ ही उनके चार प्रमुख प्रकाशन हैं, जिनमें हिन्दी सीखने के लिए 'एन इंट्रोडक्शन टू हिन्दी' (एलीमेंट्री और एडवांस लेवल) और 'सिंगापुर में भारत' (विशेष सन्दर्भ : उत्तर भारत) शामिल हैं। उन्होंने 'सिंगापुर की चयनित रचनाएँ' का सम्पादन भी किया है। उन्हें 12वें विश्व हिन्दी सम्मलेन के दौरान प्रतिष्ठित 'विश्व हिन्दी सम्मान' (फीजी 2023, भारत सरकार) के साथ ही 'प्रवासी साहित्य सम्मान', 'हिन्दी गौरव सम्मान', ‘हिन्दी सेवी सम्मान' और 'हिन्दी शिक्षण सम्मान' जैसे कई प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हुए हैं।

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