भारती जी की कविता ने पाँचवें दशक के आरम्भ में अपनी जो अनूठी पहचान बनायी, वह सदी पार कर आने तक ज्यों-की-त्यों ताज़ा तो बनी ही रही, दिनों-दिन और गहराती गयी। कथ्य की परिपक्वता और शैली के वैविध्य के साथ-साथ काव्य विषयों की परिधि जिस तरह विस्तृत होती गयी, वह सचमुच आश्चर्यजनक है। अलस्सुबह का मांसल, फिर भी स्वप्निल प्यार हो; या पुराने किले में समकालीन इतिहास की संकटपूर्ण विडम्बना, या मुँह-अँधेरे महक विखराते हरसिंगार, या पकी उम्र का प्यार, या मुनादी में जनान्दोलन की ललकार-भारती जी की संवेदना-परिधि में सब एक विशिष्ट मार्मिकता से अभिव्यक्त होते हैं। कहीं भी छद्म बौद्धिकता नहीं, बड़बोले उपदेश नहीं, सिद्धान्त छाँटने का आडम्बर नहीं-सहज संवेदनशील अभिव्यक्ति, जो सीधे मर्म को छू जाये। वर्षों की आतुर प्रतीक्षा के बाद आने वाला उनका यह काव्य संकलन उनके विशाल पाठक वर्ग के लिए एक काव्योत्सव ही नहीं है, एक अतिरिक्त विशिष्ट अनुभूति भी है, जहाँ कवि की समस्त काव्य क्षमताएँ अपने चरमोत्कर्ष पर हैं। पर वह चरमोत्कर्ष भी विराम नहीं क्योंकि है – सपना अभी भी…
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Sapna abhi bhi (सपना अभी भी)
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| Weight | 0.5 kg |
|---|---|
| Dimensions | 22.59 × 14.34 × 1.82 cm |
| Author | Dharmveer Bharti (धर्मवीर भारती) |
| Language | Hindi |
| Publisher | Vani Prakashan |
| Pages | 90 |
| Year/Edtion | 2023 |
| Subject | Poetry |
| Contents | N/A |
| About Athor | बहुचर्चित लेखक एवं सम्पादक डॉ. धर्मवीर भारती 25 दिसम्बर, 1926 को इलाहाबाद में जनमे और वहीं शिक्षा प्राप्त कर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य करने लगे। इसी दौरान कई पत्रिकाओं से भी जुड़े। अन्त में 'धर्मयुग' के सम्पादक के रूप में गम्भीर पत्रकारिता का एक मानक निर्धारित किया। |














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