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Sankshiptnatyashastram (संड़्क्षिप्तनाट्यशास्त्रम्)

Original price was: ₹695.00.Current price is: ₹452.00.

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“संड्क्षिप्तनाट्यशास्त्रम्क –
भरत का नाट्यशास्त्र सदियों से हमारे वाङ्मय का एक गौरव ग्रन्थ रहा है। संगीत, चित्रकला और साहित्य के मिश्रण से एक चौथी विधा -नाटक- के आविष्कार ने शिक्षा, मनोरंजन और ज्ञान की एक सर्वथा नयी विधा को जन-जन के सामने प्रस्तुत किया। हम कह सकते हैं कि नाटक ने मंच पर एक नये ब्रह्माण्ड ही की सृष्टि कर डाली। अकारण नहीं है कि नाट्यशास्त्र को पाँचवें वेद की संज्ञा दी गयी।
नाट्यशास्त्र पर सरसरी निगाह से भी नज़र डालें तो हम चमत्कृत रह जाते हैं, क्योंकि इसमें समूचे रंग कर्म का ऐसा विविध और विस्तृत लेखा-जोखा है जो अन्य शास्त्रों में एक स्थान पर दिखाई नहीं देता। लेकिन आम तौर पर समूचे नाट्यशास्त्र से बहुत कम लोगों का सम्बन्ध रहता है। यही कारण है कि इस पुस्तक में डॉ. राधावल्लभ त्रिपाठी ने बड़े कौशल के साथ नाट्यशास्त्र के उन अंशों का एक सम्पादित संस्करण तैयार किया है जो रंगकर्मियों और नाट्यशास्त्र के अध्येताओं के मतलब का है। अर्थात, नाट्यशास्त्र जिनके लिए रचा गया है, उन्हें वह सुलभ हो सके। इस उद्देश्य से डॉ. राधावल्लभ त्रिपाठी ने सभी मूल अवधारणाओं, प्रयोग की प्रविधियों और भरत की रंग-दृष्टि को इस संक्षिप्त नाट्यशास्त्र में प्रामाणिक रूप से प्रस्तुत किया है। इस पुस्तक की एक विशेषता यह है कि मूल पाठ के साथ-साथ उसका सहज-सरल भाषा में अनुवाद भी दे दिया गया है और साथ में जहाँ आवश्यक समझा गया है वहाँ मुद्राओं आदि के चित्र भी दे दिये गये हैं जिससे पुस्तक का महत्व बहुत बढ़ गया है। आशा है कि इस पुस्तक से रंग कर्मी ही नहीं सामान्य रंग-प्रेमी भी लाभान्वित होंगे।

Author

Weight 0.5 kg
Dimensions 22.59 × 14.34 × 1.82 cm
Author

Radhavallabh Tripathi (राधावल्लभ त्रिपाठी)

Language

Hindi

Publisher

Vani Prakashan

Pages

292

Year/Edtion

2023

Subject

Criticism

Contents

N/A

About Athor

"प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी –
सागर और उदयपुर विश्वविद्यालयों में 38 वर्षों तक अनवरत अध्यापन करने के साथ प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी का नाम देश के वरिष्ठतम संस्कृत आचार्यों में लिया जाता है। वे डॉ. हरिसिंह गौड़ विश्वविद्यालय सागर के वरिष्ठतम प्रोफ़ेसर भी हैं। वे राष्ट्रीय संस्कृति संस्थान, नयी दिल्ली के कुलपति के पद पर आसीन रहे। नाट्यशास्त्र और साहित्यशास्त्र विषयक अपने मौलिक योगदान के लिए प्रो. त्रिपाठी बहुत चर्चित रहे हैं। उन्होंने 109 पुस्तकें, 183 शोध प्रपत्र और आलोचनात्मक निबन्ध और 30 से अधिक संस्कृत नाटकों और अन्य गौरव ग्रन्थों का हिन्दी में अनुवाद किया है। अपने इस योगदान के लिए उन्हें बीस से अधिक राष्ट्रीय सम्मान दिये गये हैं। जिनमें संस्कृत काव्य के लिए साहित्य एकेडमी पुरस्कार और नाट्यशास्त्र विश्वकोश के लिए के.के. बिरला न्यास के शंकर पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। 2002-05 तक वे बैंकाक के शिल्पकोर्न विश्वविद्यालय में अतिथि प्राचार्य भी रहे हैं।
प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी ने हरिसिंह गौड़ विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में एक पाण्डुलिपि संग्रहालय और इलेक्ट्रॉनिक पुस्तकालय भी स्थापित किया है और अनेक दुर्लभ पाण्डुलिपियों की खोज की। इसके साथ-साथ उन्होंने 25 से अधिक अखिल भारतीय शोध सेमिनार आयोजित किये हैं। वे हालैण्ड, आस्ट्रिया, जर्मनी, थाईलैण्ड, इंग्लैण्ड तथा अन्य विदेशी राज्यों की यात्राएँ कर चुके हैं जहाँ उन्होंने व्याख्यान भी दिये हैं।
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