| रानियाँ सब जानती हैं – अपमान-अपराध-प्रार्थना-चुप्पी से उपजी वर्तिका नन्दा की यह कविताएँ उन रानियों ने कही हैं जिनके पास सारे सच थे पर ज़ुबां बन्द। पलकें भीगीं। साँसें भारी। मन बेदम। इन कविताओं को समाज में बिछे लाल कालीनों के नीचे से निकाल कर लिखा गया है-सुनन्दा पुष्कर का जाना, बलात्कार की शिकार निर्भया, एसिड अटैक से पीड़ित या बदबूदार गलियों में अपने शरीर की बोली लगातीं या फिर बदायूँ जैसे इलाकों में पेड़ पर लटका दी गयीं युवतियाँ इस संग्रह की साँस हैं। |
| Weight | 0.5 kg |
|---|---|
| Dimensions | 22.59 × 14.34 × 1.82 cm |
| Author | Vartika Nanda (वर्तिका नन्दा) |
| Language | Hindi |
| Publisher | Vani Prakashan |
| Pages | 100 |
| Year/Edtion | 2015 |
| Subject | Poetry |
| Contents | N/A |
| About Athor | " बलात्कार और प्रिंट मीडिया की रिपोर्टिंग पर पीएच.डी.। दिल्ली विश्वविद्यालय के लेडी श्रीराम कॉलेज में पत्रकारिता का अध्यापन जी टीवी, एनडीटीवी, भारतीय जनसंचार संस्थान, नयी दिल्ली और लोकसभा टीवी से भी जुड़ी रहीं। भारतीय टेलीविज़न में अपराध बीट की प्रमुख पत्रकार। ख़ास किताबें : तिनका तिनका तिहाड़-तिहाड़ की महिला क़ैदियों की कविताओं का अनूठा संग्रह, 2013 (बिमला मेहरा, आईपीएस के साथ सम्पादन)। थी. हूँ.. रहूँगी… घरेलू हिंसा पर देश का पहला कविता संग्रह (2012)। टेलीविज़न और क्राइम रिपोर्टिंग (2010) मीडिया पर चर्चित पुस्तक। कला : उनका लिखा गाना-तिनका तिनका तिहाड़ क़ैदियों ने गाया। सीडी भी बनी। घरेलू हिंसा पर उनकी लघु फ़िल्म नानकपुरा कुछ नहीं भूलता भारत सरकार के महिला एवं बाल विकास मन्त्रालय के अलावा सीबीएसई के यूट्यूब चैनल का भी हिस्सा। कविता में दख़ल : 2014 के जयपुर लिटरेरी फेस्टिवल और कटक लिटरेचर फेस्टिवल में आमत्रित। न्यू यॉर्क में अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन (2014) और विश्व हिन्दी सम्मेलन, दक्षिण अफ्रीका में भागीदारी (2012)। |















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