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Ramkatha Kaljayee Chetna (रामकथा : कालजयी चेतना)

Original price was: ₹200.00.Current price is: ₹130.00.

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“रामकथा कालजयी चेतना –
पुरोवाक् –
बचपन से ही राम नाम का उच्चारण हमारी दैनिक प्रार्थना का अंग था। रामायण की कथा केरल के हिन्दू घरों में महाकवि एषुत्तच्छन के अध्यात्म रामायणम् किळिप्पाट्ट के माध्यम से प्रचलित थी। घर के कुलवृद्ध कर्कटक के महीने में हर सन्ध्या में देवी देवताओं के चित्र के सामने दीप जलाकर अध्यात्म रामायण का पाठ करते थे। वैसे ही जैसे लोग उत्तर भारत में रामचरित मानस का पाठ करते थे। राम और हनुमान बचपन में हमारे प्रिय पौराणिक पात्र थे।
श्री नरेन्द्र कोहली का उपन्यास अभ्युदय पहली बार पढ़ा तो लगा कि राम की कहानी में कहीं-कहीं जो कुछ भी शंकाएँ उठती थीं, उन सब का समाधान लेखक ने अपनी रचना में प्रस्तुत किया है। अभ्युदय के अध्ययन से रामकथा की गहनाताओं में जाने का असर मिल रहा था। समझ में आया कि राम, सीता, लक्ष्मण आदि भारतीय जनमानस में क्यों और कैसे प्रविष्ट हुए हैं।
रामकथा के माध्यम से श्री नरेन्द्र कोहली पीड़ित जनता के अभ्युदय के लिए जन-आन्दोलन के पक्षधर के रूप में सामने आये। इच्छा हुई कि रामकथा को अधिक गहनता से जानना है और समझना है। परिणामत: वाल्मीकी रामायण के राम को निकट से जानने का प्रयत्न आरम्भ किया। लेकिन वाल्मीकीय रामायण के राम को अधिक समझने के लिए नहीं था; क्योंकि वाल्मीकी रामायण के राम वही थे, जो जन-मानस में स्थान पाये थे।
समझ में आया कि राम विश्वामित्र से जन कल्याण की मन्त्रदीक्षा प्राप्त करके वन जाने के अवसर की प्रतीक्षा में थे और कैकेई के दो वरों के माध्यम से उन्हें वन जाने और पीड़ित जनता का नेतृत्व करने का अवसर मिल रहा था। फिर तो संघर्ष होना ही था और अन्ततः युद्ध हुआ। राक्षसी शक्तियों का अन्त होकर जनता का अभ्युदय हुआ।
दोनों ओर से राम के सम्बन्ध में जो कुछ जाना है, पहचाना है, उसी को इस पुस्तक में अभिव्यक्त करने का प्रयत्न किया है। आशा है कि राम को अधिक जानने और भारतीय समाज की वर्तमान समस्याओं के समाधान के लिए राम की क्षमता का उपयोग करने के लिए यह अध्ययन सहायक हो सकता है।

Author

Weight 0.5 kg
Dimensions 22.59 × 14.34 × 1.82 cm
Author

Dr. K.C. Sindhu (डॉ. के.सी. सिंधु )

Language

Hindi

Publisher

Vani Prakashan

Pages

214

Year/Edtion

2012

Subject

Novel

Contents

N/A

About Athor

नरेन्द्र कोहली का जन्म 6 जनवरी 1940, सियालकोट ( अब पाकिस्तान ) में हुआ । दिल्ली विश्वविद्यालय से 1963 में एम.ए. और 1970 में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की । शुरू में पीजीडीएवी कॉलेज में कार्यरत फिर 1965 से मोतीलाल नेहरू कॉलेज में । बचपन से ही लेखन की ओर रुझान और प्रकाशन किंतु नियमित रूप से 1960 से लेखन । 1995 में सेवानिवृत्त होने के बाद पूर्ण कालिक स्वतंत्र लेखन। कहानी¸ उपन्यास¸ नाटक और व्यंग्य सभी विधाओं में अभी तक उनकी लगभग सौ पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं। उनकी जैसी प्रयोगशीलता¸ विविधता और प्रखरता कहीं और देखने को नहीं मिलती। उन्होंने इतिहास और पुराण की कहानियों को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में देखा है और बेहतरीन रचनाएँ लिखी हैं। महाभारत की कथा को अपने उपन्यास "महासमर" में समाहित किया है । सन 1988 में महासमर का प्रथम संस्करण 'बंधन' वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हुआ था । महासमर प्रकाशन के दो दशक पूरे होने पर इसका भव्य संस्करण नौ खण्डों में प्रकाशित किया है । प्रत्येक भाग महाभारत की घटनाओं की समुचित व्याख्या करता है। इससे पहले महासमर आठ खण्डों में ( बंधन, अधिकार, कर्म, धर्म, अंतराल,प्रच्छन्न, प्रत्यक्ष, निर्बन्ध) था, इसके बाद वर्ष 2010 में भव्य संस्करण के अवसर पर महासमर आनुषंगिक (खंड-नौ) प्रकाशित हुआ । महासमर भव्य संस्करण के अंतर्गत ' नरेंद्र कोहली के उपन्यास (बंधन, अधिकार, कर्म, धर्म, अंतराल,प्रच्छन्न, प्रत्यक्ष, निर्बन्ध,आनुषंगिक) प्रकाशित हैं । महासमर में 'मत्स्यगन्धा', 'सैरंध्री' और 'हिडिम्बा' के बारे में वर्णन है, लेकिन स्त्री के त्याग को हमारा पुरुष समाज भूल जाता है।जरूरत है पौराणिक कहानियों को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में समझा जाये। इसी महासमर के अंतर्गततीन उपन्यास 'मत्स्यगन्धा', 'सैरंध्री' और 'हिडिम्बा' हैं जो स्त्री वैमर्शिक दृष्टिकोण से लिखे गये हैं ।

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