प्रेमचंद एक बदलते समय के कथाकार थे। इसलिए उन्होंने लिखा है-“अब पाठक कहानियों में नये भावों, नये विचारों का, नये चरित्रों का दिग्दर्शन चाहता है।” वे नये के पक्ष में खड़े होने के बावजूद कहानी के ऐसे जातीय ढाँचे की खोज में थे, जिसमें भारतीय पाठक का जी लगे। बदलता यथार्थ कहानी के शिल्प में नवीनता लाता है, लेकिन प्रेमचंद ने सावधान किया कि शिल्प में- “सुधार के जोश में कथा की रोचकता को कम न होने दें। “। प्रेमचंद की कहानी-दृष्टि नवीनता और रोचकता के सामंजस्य पर आधारित है, जो आज भी कम अर्थपूर्ण नहीं है।
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Prem-Manjoosha (प्रेम-मंजूषा)
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प्रेमचंद एक बदलते समय के कथाकार थे। इसलिए उन्होंने लिखा है-“अब पाठक कहानियों में नये भावों, नये विचारों का, नये चरित्रों का दिग्दर्शन चाहता है।” वे नये के पक्ष में खड़े होने के बावजूद कहानी के ऐसे जातीय ढाँचे की खोज में थे, जिसमें भारतीय पाठक का जी लगे। बदलता यथार्थ कहानी के शिल्प में नवीनता लाता है, लेकिन प्रेमचंद ने सावधान किया कि शिल्प में- “सुधार के जोश में कथा की रोचकता को कम न होने दें। “। प्रेमचंद की कहानी-दृष्टि नवीनता और रोचकता के सामंजस्य पर आधारित है, जो आज भी कम अर्थपूर्ण नहीं है।
| Weight | 0.5 kg |
|---|---|
| Dimensions | 22.59 × 14.34 × 1.82 cm |
| Author | Premchand (प्रेमचंद) |
| Language | Hindi |
| Publisher | Vani Prakashan |
| Pages | 216 |
| Year/Edtion | 2024 |
| Subject | Collection of Stories |
| Contents | N/A |
| About Athor | मुंशी प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई, 1880 को वाराणसी के निकट लमही गाँव में हुआ था। उनकी शिक्षा का आरंभ उर्दू, फारसी से हुआ और जीवनयापन का अध्यापन से। 1898 में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद एक स्थानीय विद्यालय में शिक्षक बने। नौकरी के साथ ही पढ़ाई जारी रखी 1910 में इंटर पास किया और 1919 में बी.ए. पास करने के बाद स्कूलों के डिप्टी सब-इंस्पेक्टर बन गए।प्रेमचंद नाम से ‘बड़े घर की बेटी’ उनकी पहली कहानी ‘जमाना’ पत्रिका के दिसंबर 1910 के अंक में प्रकाशित हुई। छह साल तक ‘माधुरी’ पत्रिका का संपादन किया; 1930 में बनारस से अपना मासिक पत्र ‘हंस’ शुरू किया और 1932 के आरंभ में ‘जागरण’ साप्ताहिक भी निकाला। उनकी कई कृतियों का अंगेजी, रूसी, जर्मन सहित अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ। ‘गोदान’ उनकी कालजयी रचना है। उन्होंने कुल 15 उपन्यास, 300 से अधिक कहानियाँ, 3 नाटक, 10 अनुवाद, 7 बाल-पुस्तकें तथा हजारों पृष्ठों के लेख, संपादकीय, भाषण, भूमिका, पत्र आदि लिखे। लेकिन जो यश-प्रतिष्ठा उन्हें उपन्यास और कहानियों से मिली, वह अन्य विधाओं से नहीं। मरणोपरांत उनकी कहानियाँ मानसरोवर के कई खंडों में प्रकाशित हुई। स्मृतिशेष: 8 अक्तूबर, 1936, बनारस में। |















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