“नदी बहती थी –
नदी बहती थी – बंगाली जनसमाज और उनकी संस्कृति के बारे में लिखी गयी एक लम्बी कहानी है और इस कहानी में लेखक की उपस्थिति कहीं नहीं है बल्कि यह कहना अधिक सही होगा कि उसकी उपस्थिति एक दृष्टि बनकर इस कहानी में हर ओर है। जो कलकत्ता को कई आयामों में देख रही है। जैसे बादलों को ऊपर से देखने पर दृश्य कुछ और तरह का दिखता है और बादलों के भीतर से देखने पर कुछ और। यह कहानी कलकत्ता जैसे भीड़भाड़ से भरे शहर के इर्द-गिर्द बुनी गयी है। लेखक को यह शहर अजनबी और दिखावे से भरा महसूस होता है। इस शहर में उन्हें स्त्री और पुरुष काम वासना की मंशा से भरे दिखाई देते हैं। जैसे उनके बीच कोई गुप्त समझौता है और पैसा इस समझौते के बीच है।
“














Reviews
There are no reviews yet.