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मगरी मानगढ गोविन्द गिरि –
यह वह आग्नेय गाथा जिसके साथ इतिहास न्याय नहीं कर सका। अब वह जन अदालत के सामने पेश हो रही है। उसका कहना है :
07 दिसम्बर, 1908 की माघ पूर्णिमा की मगरी मानगढ़ पर राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात के लाखों आदिवासी भगत हाथ में नारियल और कटोरी में घी लिए स्वामी गाविन्द गिरि द्वारा स्थापित धूणी में आहुति दे रहे थे। कीर्तन कर रहे थे। भजन गा रहे थे।
आदिवासियों के देवता तुल्य स्वामी गोविन्द गिरि सबको आशीर्वाद दे रहे थे कि अचानक तीन तरफ़ से कर्नल शटन, कैप्टन स्टाकले और लेफ्टिनेंट डॉइस के नेतृत्व में मेवाड़ झील कोर, खेखाड़ा की कम्पनियों और राजपूत तथा जाट रेज़िमेंट ने आ घेरा और फ़ायर के साथ गोलियों की बौछार शुरू कर दी। भगतों की लाशें गिरने लगीं। भगदड़ मचने लगी। भगतों के सामने सिर्फ़ चौथा रास्ता बचा था मगरी मानगढ़ की सैकड़ों फुट गहरी तलहटी में बसा खैडापा गाँव। उधर से उतरते हुए सैकड़ों आदिवासी भगत फिसल कर खाई में जा गिरे। उनके प्राणान्त हो गये। इस हैरतअंगेज़, हैबतनाक, बर्बर और पिशाचनी नरसंहार के लिए स्वामी गोविन्द गिरि को अदालत ने ज़िम्मेदार माना और मौत की सज़ा सुना दी।
क्या यह नरसंहार काण्ड जलियाँ बाग काण्ड से किसी भी हालत में कमतर है? जलियावाला काण्ड 13 अप्रैल, 1919 को थे। हुआ था जिसमें 379 शान्तिप्रिय जन मारे गये।
नहीं तो उसे इतिहास में जलियाँवाला काण्ड सा स्थान क्यों नहीं मिला? क्यों उसकी उपेक्षा की गयी? क्या स्वामी गोविंद गिरि को इसके लिए ज़िम्मेदार माना जाना उचित था?
कृपया न्याय कीजिए। निर्णय सुनाइए।
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