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Jhoothi Hai Tetri Dadi (झूठी है तेतरी दादी )

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“झूठी है तेतरी दादी –
प्रेमचन्द से पहले हिन्दी कहानी उस रूप में नहीं थी, जिस रूप में उसे बाद में जाना गया – जिस रूप में एक साहित्य-विधा के बतौर उसने मान्यता पायी। पहले कहानी का मतलब था आख्यान, और वह आख्यान ‘कथा सरित्सागर’, ‘कादम्बरी’, ‘अरब की हज़ार रातें’ से होता हुआ हिन्दी तक आया था। प्रेमचन्द ने आख्यान-तत्त्व को बरकरार रखते हुए, उसमें भारत के सामाजिक-आर्थिक राजनीतिक यथार्थ की भावना देकर हिन्दी कहानी का विकास किया। उसके बाद हिन्दी कहानी वह नहीं रह गयी, जो पहले थी।
स्वातन्त्र्योत्तर हिन्दी कहानी को इसी आलोक में देखना होगा। कुछ क्षेपकों को छोड़ दें, तो ’80, ’90 और 2000 के दशकों में जो युवा पीढ़ियाँ कहानी की ज़मीन पर अवतरित हुई उनके लाइट हाउस प्रेमचन्द ही हैं। 1980 के दशक के कथाकारों में प्रेमचन्द की यथार्थवादी धारा को वर्तमान तक लाने वाले हस्ताक्षरों में संजीव का नाम अग्रणी है। वे उन कथाकारों में भी हैं जिनके नाम के साथ अंग्रेज़ी का ‘प्रोलिफिक’ विशेषण बेहिचक जोड़ा जा सकता है। सात उपन्यासों और ग्यारह कहानी संग्रहों के साथ वे समकालीन कथाकारों में दूर से पहचाने जाते हैं। लोक संस्कृति और शहरी संस्कृति के द्वन्द को जिस पैनी दृष्टि से उनकी रचनाएँ उभारती हैं, उसी अभिज्ञा के साथ भूमण्डलीकरण, बाज़ार अर्थ-नीति और विकास के निहितार्थ भी उनके यहाँ उजागर होते हैं। ग्यारह कहानियों के संजीव के इस नये संग्रह में भी सजग पाठक देखेंगे कि एक ओर जहाँ ग्राम-समाज में पारम्परिक सामन्ती ढाँचा बुरी तरह चरमरा रहा है और एक तरह का नया अर्थवाद उभरकर सामने आ रहा है (मौसम), वहीं दूसरी ओर पर्दा प्रथा, जाति और वर्ण की जकड़बन्दी यथावत् है, जिसका आखेट तेतरी जैसी निश्छल-निरक्षर महिलाएँ होती हैं। यहाँ संजीव ‘हत्यारा’ और ‘हत्यारे’, ‘नायक’ और ‘खलनायक’ और ‘अभिनय’ को जिन अर्थों में परिभाषित करते हैं, उनके बाज़ार-पूँजीवाद, कृषि-विमुख औद्योगिक जाल और मीडिया द्वारा प्रचारित नयी रूढ़ियों के अट्टहास साफ़-साफ़ सुने जायेंगे।
संजीव की ये कहानियाँ आज के विश्व-समय की हमारे सामाजिक जीवन और आर्थिक ढाँचे पर पड़ रही प्रतिछाया का अभिलेख भर नहीं हैं, बल्कि एक ज़रूरी और उत्तेजक विमर्श भी खड़ा करती हैं, जिसका सम्बन्ध हम-आप सब से है।

Author

Weight 0.5 kg
Dimensions 22.59 × 14.34 × 1.82 cm
Author

Sanjeev (संजीव )

Language

Hindi

Publisher

Vani Prakashan

Pages

99

Year/Edtion

2012

Subject

Collection of Short Stories

Contents

N/A

About Athor

"संजीव –
जन्म : 6 जुलाई, 1947, बांगर कलां, सुल्तानपुर (उ.प्र.)।
शिक्षा : बी.एस.सी., ए.आई.सी. (भारत)।
प्रकाशित कृतियाँ : 'तीस साल का सफ़रनामा', 'आप यहाँ हैं', 'भूमिका और अन्य कहानियाँ', 'दुनिया की सबसे हसीन औरत', 'प्रेत मुक्ति', 'ब्लैक होल', 'खोज', 'गति का पहला सिद्धान्त', 'गुफा का आदमी', 'आरोहण', 'दस कहानियाँ', 'गली के मोड़ पर सूना-सा एक दरवाज़ा' (कथा संग्रह), 'किशनगढ़ के अहेरी', 'सर्कस', 'सावधान नीचे आग है', 'धारा', 'पाँव तले की दूब', 'जंगल जहाँ शुरू होता है', 'सूत्रधार', 'आकाश चंपा' (उपन्यास), रानी की सराय (किशोर उपन्यास), भिड़न्त (बाल कहानियाँ)।
इसके अतिरिक्त विपुल मात्रा में विविध असंकलित लेखन।

सैंतीस वर्षों तक इस्को, कुलटी में रसायनज्ञ रहने के बाद स्वैच्छिक सेवा अवकाश। अनेक संस्थाओं के सलाहकार सदस्य रह चुके हैं। कुछ महीने हैदराबाद विश्वविद्यालय के विज़िटिंग प्रोफ़ेसर, कुछ महीने अक्षर पर्व (रायपुर) के सम्पादक, साल भर माधव प्रकाशन की सम्पादकी के बाद फिलवक़्त प्रमुख कथा मासिक 'हंस' (नयी दिल्ली) के कार्यकारी सम्पादक।

कई भाषाओं में अनूदित, मंचित 'सावधान नीचे आग है' के एक अंश पर टेली फ़िल्म 'काला हीरा', 'हिमरेखा' और 'सूत्रधार' पर फ़िल्में निर्माणाधीन। कई पाठ्यक्रमों में कहानियाँ शामिल।

कई पुरस्कारों एवं सम्मानों से नवाजे गये। जिनमें से कुछ हैं-
प्रथम कथाक्रम सम्मान- 1997, गण मित्र सम्मान- 1998, इन्दु शर्मा स्मृति अन्तरराष्ट्रीय सम्मान, लन्दन – 2001, प्रेमचन्द सम्मान (40 बंग) – 2002, भिखारी ठाकुर लोक सम्मान-2005, पहले सम्मान 2006, जनपद सम्मान, सुल्तानपुर- 2006, सुधा स्मृति सम्मान, भागलपुर- 2008।
"

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