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Darwaza (दरवाज़ा)

Original price was: ₹350.00.Current price is: ₹227.00.

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“दरवाज़ा –
‘दरवाज़ा’ मॉगदॉ सॉबो की तीन सर्वप्रसिद्ध पुस्तकों में से एक है जिसका अनुवाद विश्व की अनेक भाषाओं में हो चुका हैं।
उपन्यास का कथानक लेखिका और उसकी सेविका के इर्द-गिर्द घूमता है। मुख्य पात्र ऐमैरेन्ट्स और लेखिका के बीच कुछ ऐसे सम्बन्ध की कहानी है यह, जो इस रिश्ते के द्वारा ऐमैरेन्ट्स के चरित्र के दर्शन कराती है। हंगरी के, प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्वयुद्ध के बीच के राजनीतिक परिवेश का भी लेखा-जोखा – पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत होता है मगर कहानी की धुरी केवल ऐमैरेन्ट्स सैरेदाश के ही चारों ओर घूमती है।

इस पुस्तक का अनुवाद विश्व की पैंतीस भाषाओं में हो चुका है। लेखिका ने इस पर टिप्पणी करते हुए एक जगह लिखा है, ‘मैंने तो यह उपन्यास ऐमैरेन्ट्स का क़र्ज़ चुकाने के लिए लिखा था। मुझे क्या मालूम था कि अपनी झाड़ू से सबके दुख-दर्द साफ़ करने वाली इस महिला का जादू सबके सिर चढ़ कर बोलेगा। अब भी पाठकगण मेरी बालकनी में आ कर उसका घर देखने की माँग करते हैं और वियोला के बारे में प्रश्न करते हैं।’

उपन्यास बहुत रोचक ढंग से लिखा गया है। आशा है पाठकों को भी पसन्द आयेगा। अनुवाद में रह गयी त्रुटियों के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ।

Author

Weight 0.5 kg
Dimensions 22.59 × 14.34 × 1.82 cm
Author

Magda Szabo Translated By Indu Mazaldan (मॉगदा सॉबो, अनुवाद – इन्दु मज़लदान)

Language

Hindi

Publisher

Vani Prakashan

Pages

224

Year/Edtion

2009

Subject

Novel

Contents

N/A

About Athor

"मॉगदॉ सॉबो –
मॉगदॉ सॉबो का जन्म 5 अक्टूबर, 1917 में हुआ। इन्होंने हंगरी के पूर्वी प्रान्त दैबैत्सन में एक अध्यापिका के रूप में काम करना शुरू किया। 1945 और 1949 के बीच यह शिक्षा मन्त्रालय में कार्यरत थीं। सन् 1947 में इनका विवाह तिबोर सावो के साथ हुआ, जो स्वयं भी एक लेखक और अनुवादक थे।

आपकी पहली पुस्तक एक कविता-संग्रह 'मेमना' के नाम से 1947 में प्रकाशित हुई, जिसके बाद दूसरा कविता संग्रह 'फिर से इन्सान की ओर' 1949 में छपा। इस के लिए इन्हें बॉयगार्टन पुरस्कार मिला, जो राजनीतिक कारणों से उसी दिन वापिस भी ले लिया गया जिस दिन उसकी घोषणा हुई थी और उसी वर्ष उन्हें मिनिस्ट्री से भी निकाल दिया गया।

कट्टर कम्युनिस्ट पार्टी के राज में (1945 से 1958 तक) इनके और इनके पति के साहित्य को हंगरी में छपने पर पाबन्दी लगा दी गयी थी। अतः इन्हें इस बीच अपना गुज़ारा चलाने के लिए एक स्कूल में अध्यापक की नौकरी करनी पड़ी। इसी दौरान इन्हें यह लगने लगा कि कविता की सीमाएँ बहुत छोटी थीं जिसमें यह अपनी अनुभूतियों को अधिक अच्छी तरह व्यक्त नहीं कर सकती थीं, इस कारण इन्होंने गद्य को अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। इस प्रतिबन्ध के समय में ही इन्होंने अपना पहला उपन्यास 'फ्रेस्को' लिखा जो 1958 में ही छपा। यह उपन्यास सर्वाधिक लोकप्रिय हुआ।

अनुवादक : इन्दु मज़लदान –

1992 से आप हंगारी भाषा के पठन-पाठन से जुड़ी हुई हैं। बुदापेश्त जाकर हंगारी भाषा और साहित्य का अध्ययन कर आने के बाद आप हंगारी साहित्य का हिन्दी में अनुवाद कर रही हैं। इनकी छः पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं- 'प्रेम राग' ( हंगारी प्रेम कविता संकलन), 'वित्त मंत्री का नाश्ता' (हंगारी कहानी संग्रह), शान्दोर मारोई का उपन्यास A gyertyak csonkig égnek का हिन्दी अनुवाद 'शमाएँ ख़ाक होने तक सुलगती हैं', पहली हंगारी महिला लेखिका का उपन्यास 'रंग एवं वर्ष', कोस्तोलान्यी दैश्ज़ो का उपन्यास Pacsirta का हिन्दी अनुवाद 'चकोरी' व नोबेल पुरस्कार विजेता इमरे कैरतेस के उपन्यास Sorstalanság का हिन्दी अनुवाद 'नियतिहीनता'।
"

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