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Beete Kitane Baras (बीते कितने बरस)

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“प्रयाग शुक्ल हिन्दी के एक ऐसे कवि हैं जिनकी कविताएँ प्रकृति से मनुष्यों और मनुष्यों से प्रकृति तक की यात्रा अपने नैरन्तर्य में बिना किसी निग्रह के जिस तरह करती हैं, वह उनके सृजनलोक को अपनी दृष्टि, संवेदना और भाषा-शैली में विपुल तो बनाता ही है, विशिष्ट भी बनाता है । और इसका उदाहरण है उनका यह कविता-संग्रह बीते कितने बरस ।

प्रयाग जी की विषय-वस्तु गढ़ी हुई नहीं, जी हुई होती है, इसलिए उनकी चिन्ताएँ गहन रात में भी जाग रही होती हैं और अपनी सोच में विचरती रहती हैं जिन्हें ‘होटल के कमरे में रात को’ कविता में स्पष्ट देखा जा सकता है, जहाँ बाहर की आवाजें अन्दर तक आ रहीं – कौन है जो भगाये ले जा रहा है मोटर साइकिल रात को सड़कों पर सोया है शहर जब… क्या है भगोड़ा वह …घर पर कोई बीमार है …कौन है/\… नींद फुटपाथों की तोड़ता/कुत्तों को भँकता/छोड़ता! फिर वह सिहर भी जाते हैं-चीरता हुआ रात को कौन है? हत्यारा? वे जब ‘उन्माद के ख़िलाफ़ एक कविता’ लिखते हैं तब उन्माद की गहरी पड़ताल करते प्रकृति के ज़रिये इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि बीजों, पेड़ों, पत्तों में नहीं होता उन्माद । वह आँधी में होता है जो ज़्यादा देर तक तो नहीं ठहरती लेकिन बहुत कुछ ध्वंस करके चली जाती है। इसलिए हम जब उन्माद में होते हैं, देख नहीं पाते फूलों के रंग क्योंकि फूलों के रंग देखने के लिए मनुष्य होना ज़रूरी होता है। यह कविता ऊपरी तौर पर राजनीतिक न होते हुए भी साम्प्रदायिकता के बारे में कुछ कह जाती है; और ‘वहाँ’ कविता में जो दंगे का धुआँ है, उसे भी दूर से ही सही, गहरे समझा जा सकता है। उन्माद के इस परिदृश्य में उनकी ‘युद्ध’ कविता को भी पढ़ा जा सकता है, जो अपनी कहन में इतनी मार्मिक है कि अन्दर तक हिला देती है-अरे, वहाँ कोई घर/भहराया/वह भी किसी आदमी का था/उसमें भी रहते थे बच्चे।

दुःख पर तो कइयों ने कविताएँ लिखी हैं लेकिन प्रयाग जी अपनी बानी से जो बिम्ब रचते हैं, वह दूर तक कहीं दिखाई नहीं देते। ‘एक दृश्य’ की ये पंक्तियाँ- एक घड़े के आधे टूटे हुए मुँह के भीतर/भरा है दुःख हों या ‘स्त्रियाँ लाती थीं मीलों दूर से भरकर घड़े’ की ये पंक्तियाँ – आँधी चलती थी/बूँदें गिरती थीं/रोती थीं कविता/की दुनिया में रात को नदियाँ वेदना के एक अनछुए छोर तक लिये चली जाती हैं। इसलिए वे जब सम्बन्ध-सूत्र रचते हैं, दुःख या त्रासदी को बाँचते भरोसे को रचते हैं जो कहीं से भी सायास नहीं लगता ।

प्रयाग जी महानगरीय जीवन में नित्य कुछ घटते-छूटते को भी जिस बेचैन स्वर में अभिव्यक्ति देते हैं, उसे उनकी ‘महानगर में कुछ इच्छाएँ’, ‘महानगर में प्रकृति कविता’, ‘छतें’, ‘नौकरी’ आदि रचनाओं में गहरे आत्मसात् किया जा सकता है। ऐसे में वे स्मृतियों में जाना, वहाँ से कुछ साँसें बटोर लाना ज़रूरी समझते हैं, और इसकी बानगी उनकी ‘ग्रुप फ़ोटो’, ‘गली में’, ‘धूप में भाई’, ‘हमारा घर’ आदि कविताओं में परिलक्षित होती है। वे जब प्रकृति को जीवन और जीवन को प्रकृति के क़रीब देखते हैं, अन्तःसम्बन्ध को काव्यराग में बदल देना चाहते हैं, और इसे उन्होंने ‘शाम को लाली’, ‘खिड़की से पेड़’, ‘वर्षा-चित्र’, ‘घनी रात’, ‘शाम को गाँव में’, ‘सूरजमुखी’, ‘चिड़ियों के झुण्ड’, ‘सुबह के कबूतर’ जैसी रचनाओं में बखूबी सृजित भी किया है। इसी श्रेणी में अपने सौन्दर्य में एक अद्भुत और अविस्मरणीय कविता है ‘पंछियों के पैर’ ।

कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि नयी साज-सज्जा में कुछ नयी रचनाओं के साथ संगृहील बीते कितने बरस से गुज़रने के बाद कविताएँ हमसे छूट नहीं जातीं, हमारे अन्तस्तल में कहीं रच-बस जाती हैं, ताकि हम उस अनुभव से अवगत हो सकें जो कवि का निजी होते हुए भी निजी प्रतीत नहीं होता। और यह एक ऐसा हेतु जो उन्हें अपने पुरखे कवियों की परम्परा से जुड़े होकर भी अलग से कला-आभा देता है।”

Author

Weight 0.5 kg
Dimensions 22.59 × 14.34 × 1.82 cm
Author

Prayag Shukla (प्रयाग शुक्ल)

Language

Hindi

Publisher

Vani Prakashan

Pages

86

Year/Edtion

2024

Subject

Poetry Collection

Contents

N/A

About Athor

प्रयाग शुक्ल -कवि, कथाकार, निबन्धकार, अनुवादक, कला व फ़िल्म-समीक्षक ।28 मई, 1940 को कोलकाता में जन्म। कलकत्ता विश्वविद्यालय के स्नातक। यह जो हरा है, इस पृष्ठ पर, सुनयना फिर यह न कहना, यानी कई वर्ष समेत 10 कविता-संग्रह, तीन उपन्यास, छह कहानी-संग्रह और यात्रा-वृत्तान्तों की भी कई पुस्तकें प्रकाशित ।कला-सम्बन्धी पुस्तकों में आज की कला, हेलेन गैनली की नोटबुक; कला-लेखन संचयन कला की दुनिया में, हुसेन की छाप, स्वामीनाथन : एक जीवनी; फ़िल्म-समीक्षा की पुस्तक जीवन को गढ़ती फ़िल्में चर्चित-प्रशंसित हैं।बांग्ला से रवीन्द्रनाथ ठाकुर की गीतांजलि का अनुवाद और उनके कुछ अन्य गीतों का भी, जो सुनो! दीपशालिनी में संकलित हैं। बांग्ला से ही जीवनानन्द दास, शंख घोष और तसलीमा नसरीन की कविताओं के भी अनुवाद किये हैं। बंकिमचन्द्र के प्रतिनिधि निबन्धों के अनुवाद पर साहित्य अकादेमी का 'अनुवाद पुरस्कार' प्राप्त हुआ है। साहित्य अकादेमी से ही ओक्तावियो पाज़ की कविताएँ पुस्तक प्रकाशित । आलोचना की एक पुस्तक अर्ध विराम और निबन्धों का संकलन हाट और समाज भी उपलब्ध हैं। यात्रा-सम्बन्धी पुस्तकों में सम पर सूर्यास्त, सुरगाँव बंजारी, त्रांदाइम में ट्राम, ग्लोब और गुब्बारे उल्लेखनीय हैं। सम्पादित पुस्तकें हैं : कल्पना-काशी अंक, कविता नदी, कला और कविता, रंग तेन्दुलकर, अंकयात्रा। शीघ्र प्रकाश्य पुस्तकें : फिर कोई फूल खिला (ललित टिप्पणियाँ), वे मुझे बुला रहे हैं (अनुवाद, विश्व-कविता)। बच्चों के लिए लिखने में विशेष रुचि । बाल-साहित्य की एक दर्जन किताबें प्रकाशित-चर्चित ।सम्प्रति : स्वतन्त्र लेखन और चित्र-रचना ।ई-मेल : prayagshukla2018@gmail.com

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